Tuesday, August 02, 2016

आ गए तुम

आ गए तुम!!
द्वार खुला है
अंदर आ जाओ..
ड्योढी पर पड़े पायदान परअपना अहं झाड़ आना..
अपनी नाराज़गी वहीँ उड़ेल आना ..
मन की चटकन चढ़ा आना..
जूतों संग हर नकारात्मकता उतार आना..
थोड़ी शरारत माँग लाना..
तोड़ कर पहन आना..
तुम्हारी थकान पर मनुहारों का पँखा झल दूँ..
सूरज क्षितिज पर बाँधा है
लाली छिड़की है नभ पर..
घूँट घूँट पीना..
पर तनिक ठहरो मधुमालती लिपटी है मुंडेर से
तुलसी के क्यारे में
अपनी व्यस्ततायें बाहर खूंटी पर ही टांग आना
बाहर किलोलते बच्चों से
वो गुलाब के गमले में मुस्कान लगी है
लाओ अपनी उलझने मुझे थमा दो
देखो शाम बिछाई है मैंने
प्रेम और विश्वास की मद्धम आंच पर चाय चढ़ाई है
सुनो इतना मुश्किल भी नहीं हैं जीना...

(Rahul Saxena)

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