बात शायद अजीब सी है ....
हम लिखते हैं ...
एहसास..या ...कोरी कल्पना ...
प्रेम..या ..नफ़रत ....धोखा ...दर्द...
लोग पढ़ते हैं ...जुड़ते हैं ....
पूछते भी हैं....खोजते भी हैं !!!;
इसमें... कितनी जुड़ी.... लेखक की ..खुद की.. ज़िन्दगी है !!!
उसका खुद का प्रेम है ...
या दर्द... शायद उसी का है ...या किसी का उधार लिया ...
पर सच ही जब कोई किसी के प्रेम मे होता है ...
तो वो जीता है ...
सिर्फ और सिर्फ उस पल को ...
और तब उसे कागज़ और कलम याद नहीं आते....
और
जब लिखता है...
तो कहीं न कहीं वो
शब्दों मे खोया होता है ..एहसासों में नहीं !!
और
कभी जब दर्द में घिरा होता है ..
.तो टूट जाना चाहता है ...
एक नासमझ बच्चे की ही तरह बिलखना चाहता है ...
एक समझदार ...
लेखक की तरह कलम नहीं उठा पाता...
सच ...
लेखक भी अपना प्रेम या दर्द ....
सबकी तरह जीता ही है ....यूँ लिख नहीं पाता..
लिखता तो शब्दों का सिरा ही है.....
वही सिरा जो सबको अपना सा लग सके .....
तो इन कहानियों में... ना ढूढों मुझे ...
क्या पता... इन कहानियों में हम नहीं...
कहीं छुपे हुए " तुम " ही हो !!!
.
Manjari Mishra
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