Friday, June 05, 2026

शेष शर्त.............(सरोज दुबे)

 जब मामा के घर पहुंची तो विभा बाहर जाने की तैयारी में थी.

‘‘हाय दीदी, आप. आज ?जरा जल्दी में हूं, प्रैस जाने का समय हो गया है, शाम को मिलते हैं,’’ वह उल्लास से बोली.
‘‘प्रभा को तुम्हारे दर्शन हो गए, यही क्या कम है. अब शाम को तुम कब लौटोगी, इस का कोई ठिकाना है क्या?’’ तभी मामी की आवाज सुनाई दी.
‘‘नहींनहीं, तुम निकलो, विभा. थोड़ी देर बाद मुझे भी बाहर जाना है,’’ मैं ने कहा.
मामाजी कहीं गए हुए थे. अमित के स्नान कर के आते ही मामी ने खाना मेज पर लगा दिया. पारिवारिक चर्र्चा करते हुए हम ने भोजन आरंभ किया. मामी थकीथकी सी लग रही थीं.

Monday, April 20, 2026

कंचन .............(रवींद्रनाथ टैगोर)

 मैं विदेश लौटकर छोटा नागपुर के एक चन्द्रवंशीय राजा के दरबार में नौकरी करने लगा। उन्हीं दिनों मेरी देशव्यापी कीर्ति की पटल पर अचानक एक छोटी-सी कहानी खिल उठी। उन दिनों गगन टेसू की रक्तिमाभा से विभोर था। शाल वृक्ष की टहनियों पर मंजरियां झूल रही थीं। मधुमक्खियों के समूह मंडराते फिर रहे थे। व्यापारी लोगों का लाख संग्रह का समय आ गया था। बेर और शहतूत के पत्तों से रेशम के कीड़े इकट्ठे किए जा रहे थे। संथाल जाति महुए बीनती हुई फिर रही थी। नूपुर की झंकार के समान गूंजती हुई नदी वहीं पर बही जा रही थी। मैंने स्नेह से उस नदी का नाम रखा था- 'तनिका'।

उस समय का वातावरण अनोखे आवेश से परिपूर्ण था। उसका मेरे मन पर भी अधिकार हो गया था। जिससे कार्य की गति मंथर पड़ गई थी। तब मैं अपने पर ही खीझ उठा था।
दिन ढल रहा था। एक स्थान पर दोआबा बनाती हुई नदी दो शाखाओं में विभक्त होकर चली गई है। उसी बालू के टीले पर बगुलों की पंक्ति शान्त बैठी थी। अपनी झोली में रंग-बिरंगे पत्थरों को भरे मैं कोठी को लौट रहा था। यह सोचकर कि अपनी विज्ञान-शाला में इनकी परीक्षा करूंगा। निर्जन वन में अकेले आदमी का समय काटना कठिन-सा हो जाता है अत: मैंने संध्या के बाद का समय प्रयोग के लिए नियत कर लिया है। डायनुमा द्वारा बिजली की रोशनी कर बैठ जाता हूं। नाना प्रकार के रासायनिक द्रव्य, माइक्रोस्कोप और तराजू लेकर। इसी प्रकार बैठे-बैठे कभी-कभी आधी रात हो जाती है। मुझे आज विशेष खोज के बाद 'मेगनीज' के चिद्दों का आभास मिला था। इसलिए मेरी वापसी आज विशेष उत्साह के साथ हो रही थी। उस वातावरण में कौए कांव-कांव करते हुए सिर पर से अपने-अपने नीड़ों की ओर बढ़े जा रहे थे।
इसी समय मेरे सम्मुख आकर एक बाधा खड़ी हो गई। उस निर्जन पथ के एक टीले पर पांच शाल वृक्षों का एक ब्यू ह जैसा खड़ा था। उसके झुरमुट में बैठे हुए व्यक्ति को केवल एक ही ओर संधि से देखा जा सकता था। उस समय मेघों के अन्तराल से एक आश्चर्यमयी दीप्ति फूटकर निकल रही थी। उस छायामय वातावरण के भीतर गगन की लालिमा मानो किसी दिवंगना के खुले आंचल से गिरने वाले स्वर्ग की तरह छितरा रही थी। उसी विशेष ज्योति के पथ पर वह कोमलांगी बैठी थी। उस पेड़ के तने से टिककर दोनों पैरों की छाती के समीप समेटे वह मन लगाकर कुछ लिखे जा रही थी।
मैं वृक्ष की आड़ में खड़ा-खड़ा केवल उसकी ओर ताकता भर रहा। हृदय के आगारों में एक अनोखी छवि अंकित होने लगी। अपनी विशद् जानकारी के पथ पर मेरा हृदय कितने ही चक्कर काटकर प्रवेश-द्वार तक आ पहुंचा था; किन्तु मैं सदैव ही उससे खिसक जाता था। लेकिन आज ऐसा जान पड़ा, मानो जीवन के किसी चरम संघर्ष में आ गया हूं। यह कैसे हो गया? उसका मुझे पता नहीं। मैं तो सदैव से अपने को पर्वत की तरह नीरस समझता आया था। अनायास ही भीतर से एक झरना फूट पड़ा।
उस बाला को भी मेरे खड़े होने का कुछ आभास-सा हो गया। उसने लिखना बन्द कर दिया; किन्तु उठ न सकी। मैंने सोचा कि कहूं- ''क्षमा कीजिए! किन्तु कैसी क्षमा? मैंने ऐसा कौन-सा दण्डनीय कार्य किया था?''
यही सोचता हुआ मैं अपनी कोठी की ओर बढ़ा चला आ रहा था तभी मेरी दृष्टि नीचे पड़े दो टुकड़ों में फाड़े हुए किसी पत्र के लिफाफे पर जा पड़ी। मैंने उठाकर देखा-नाम, भवतोष मजूमदार, आई.सी.एस., मुकाम छपरा; हाथ की लिखावट लड़कियों जैसी। टिकट लगा हुआ है, लेकिन उस पर डाकखाने की मोहर नहीं। मेरी अक्ल ने झट समझ लिया कि फटे पत्र के लिफाफे पर किसी दुखान्त नाटक का क्षत चिन्ह विद्यमान है और मैंने उस लिफाफे के रहस्य को जानने का भी संकल्प कर लिया।
जियोलॉजी के अध्ययन अभ्यास के साथ भीतर-ही-भीतर इस रहस्योद्धाटन का काम भी चल रहा था। जिस समय मैं रेडियम का कण पाने की आशा लेकर अनुसंधान में डूबा हुआ था। उस समय मैंने कुसुमित शाल वृक्षों की छाया और प्रकाश के बन्धन में कंचन को देखा था। इसमें कोई शक नहीं कि इससे पूर्व भी बंगाली बाला को निहारा था; किन्तु इस स्वतंत्र और एकांत वातावरण में देखने का अवसर कभी नहीं मिला। यहां उसकी सलोनी देह की कोमलता के साथ वन के फूल ने अपनी भाषा का स्वर मिला दिया। विदेशी कोमलांगियों के दर्शन तो बहुत किये थे, सम्भवत: वे भली भी लगी थीं; किन्तु बंगाली बाला को पहली बार ही इस प्रकार से देखा कि उसकी समग्रता को उपलब्ध किया जा सके। उसे देखकर यह प्रतीत नहीं होता कि उसका सम्बन्ध किताबों से छूटा या नहीं...।
बहुत दिन पहले, बाल्यावस्था में किन्हीं बसु महाशय का जो गीत मैंने सुना था और जिसे सुनकर भी भुला दिया था, न जाने क्यों ऐसा जान पड़ा कि उस राग की सहज संगिनी में इसी बंगाली लड़की के रूप की जो भूमिका व्यंजित है, वह आज मेरी आंखों के समक्ष साकार हो उठी है।
जियोलॉजी शास्त्र में पढ़ा था कि पृथ्वी के नीचे छुपी हुई आग्नेय सामग्री सहसा तेज भूकम्प से आंदोलितावस्था में ऊपर आ जाती है। आज अपने ही निम्न स्तर के अन्धकार में छुपी हुई उसी तपी भली सामग्री को सहसा ऊपर के प्रकाश में देखा। कठोर विज्ञानी नवीन माधव के अन्तस्थल में इस प्रकार आंदोलितावस्था की मैंने कभी आशा नहीं की थी।
पता लग गया कि प्रतिदिन तीसरे पहर जब इसी मार्ग से काम से लौटा करता तो वह मुझे विशेष दृष्टि से देखा करती पर उसकी दृष्टि में क्या है यह अब तक मैं समझ नहीं सका था? कभी-कभी मैं मार्ग चलता हुआ पीछे की ओर मुड़कर देख लेता तो ऐसा लगता, कंचन मेरे ओझल होने के मार्ग की ओर देख रही है, मुझे मुड़ता देख वह अपनी दृष्टि घुमाकर उन कागजों की ओर कर लेती, जिन पर बैठी वह लिखा करती थी।
मेरे विज्ञानी मन को ऐसा लगा कि वह किसी को पाने के लिए इतना कठोर व्रत कर रही है? भवतोष विलायत से लौटकर छपरे में असिस्टेंट मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त हो गया है। विलायत जाने से पूर्व इन दोनों में यहीं रहते समय गम्भीर प्रणय हो गया था। परन्तु अब पद की नियुक्ति के बाद कोई विशेष विप्लव घट चुका है। असल बात क्या है? इसकी तो जानकारी करने से ही पता लगेगा।
मेरे लिए जानकारी करना कोई कठिन कार्य नहीं था; क्योंकि मेरे सहपाठी बंकिम बाबू पटना विश्वविद्यालय में काम करते थे। उनको पत्र लिखकर डाल दिया- 'बिहार की सिविल सर्विस में कोई भवतोष महाशय है। मेरे किसी मित्र ने अपनी लड़की के लिए इन्हें पसन्द किया है। इस कार्य में मेरा सहयोग चाहते हैं। रास्ता पथरीला तो नहीं। इसका पूरा पता लगाकर मुझे लिखो तो मैं आभारी रहूंगा। उन महाशय का विवाह के लिए क्या मत है, यह भी लिखिये?''
पत्र का उत्तर मिला- ''रास्ता पथरीले से भी अधिक बढ़कर है। उसकी राय के विषय में सुनो। जब मैं कॉलिज में डॉ. अनिलकुमार का छात्र था। जितना साधारण उनका पांडित्य था उतना ही सरल उनका हृदय। उनकी नातिन को देखो तो पता लगेगा कि सरस्वतीदेवी ने उनकी साधना से संतुष्ट होकर, उनके बुध्दि लोक को ही प्रकाशित नहीं किया बल्कि वह रूप सुधा को लेकर उनकी गोदी में आ भी गई हैं। तुम्हारा शैतान भवतोष उनके इसी स्वर्गलोक में न जाने कहां से आन पड़ा? उसकी बुध्दि प्रखर थी और वाक्पटुता में वह निपुण। पहले धोखा खाया डॉक्टर साहब ने और बाद में उनकी नातिन ने। विवाह सम्बन्ध निश्चित हो चुका था; प्रतीक्षा थी भवतोष की विलायत से लौटने की। वहां का सारा खर्च डॉक्टर साहब ने दिया था। सिविल सर्विस की परीक्षा पास करके जब वह भारत आया और यहां के किसी उच्च पदाधिकारी की कन्या से विवाह कर लिया? उसके इन कुकृत्य और लज्जा से क्षुब्ध होकर डॉक्टर साहब नौकरी को तिलांजलि देकर अपनी नातिन के साथ कहां चले गये? इसका कुछ पता नहीं।''
पत्र को पढ़कर कंचन की परिस्थिति का पूर्ण आभास हुआ। तभी दृढ़ संकल्प किया कि उसको लज्जा और अवसाद से मुक्त करूंगा।
दिवाकर अस्ताचल की ओर जा रहे थे। संध्या अपना आवरण फैला रही थी। यह समय कंचन का घर लौटने का हो गया था। तभी कोई गंवार उसके हाथ से लिखे हुए पृष्ठ छीनकर भाग खड़ा हुआ। मैंने उसका पीछा किया और उन पृष्ठों को पाने में सफल हो गया। मैंने वे सब कंचन को लौटा दिये। अपनी संपत्ति को वापस आया देख कंचन ने स्निग्ध दृष्टि से देखते हुए कहा- ''सौभाग्य से आप...।''
मैंने कहा- ''भाग चले थे कि वह आया...।''
''इसका आशय।''
''स्पष्ट है।''
''मैं नहीं समझी।''
''यही कि उसकी सहायता से आपके साथ ही पहली बात हो गई। इससे पूर्व वही सोचता रहता था कि कैसे और क्या बोलूं?''
''किन्तु वह तो एक...''
''क्या एक?''
''डाकू।''
''नहीं, वह डाकू नहीं, वह मेरा ही सिपाही था।''
कंचन अपने गहरे रंग की साड़ी का छोर पकड़, अपने मुंह पर रख खिलखिलाकर हंस पड़ी। हंसी के रुकते ही उसने कहा- ''काश, यह सच होता तो बड़ा मजा आता।''
''जिसके यहां डाका पड़ा उसको।''
''उध्दार करने वाले के लिए क्या होगा?''
''उसे घर पर ले जाकर चाय पिला देती।''
''और इस नकली उध्दारकर्ता का क्या होगा?''
''उसने जो चाहा था मिल गया।''
''क्या मिल गया?''
''परिचय की पहली बात और क्या?''
''बस।''
''हां।''
''मैं चाहता हूं।''
''क्या चाहते हैं आप?''
''बातों का क्रम अब समाप्त न हो जाए।''
''समाप्त कैसे होगा?''
''अच्छा यदि आप होतीं तो पहली बात आप क्या कहतीं?''
''मैं तो केवल यही पूछती कि सड़कों पर से पत्थर चुनने में लड़कपन नहीं लगा आपको?''
''फिर आपने पूछा क्यों नहीं?''
''डर लगता था।''
''डर! मुझसे।''
''हां, दादू से सुना था कि आप बड़े विद्वान हैं। उन्होंने विलायत से छपा हुआ आपका लेख पड़ा था। उन्होंने उसे समझने का प्रयत्न किया, पर मैं समझ न सकी।''
तभी किसी की आवाज सुनाई दी- ''दीदी कहां हो तुम? अन्धेरा हो गया है। आजकल समय अच्छा नहीं है।'' डॉक्टर साहब के उपस्थित होते ही मैंने उनके चरणों की धूल लेकर प्रणाम किया। वे तनिक सहम गये। परिचय दिया- ''मेरा नाम नवीन माधव सेन गुप्त है।''
उसे सुनकर वृध्द डॉक्टर का मुख उज्ज्वल हो उठा, बोले-
''क्या कहते हो? आप ही डॉक्टर सेन गुप्त हैं? आप तो बच्चे हैं।''
मैंने उत्तर दिया- ''अभी बच्चा ही हूं, मैंने अभी छत्तीस को पार किया है।''
''आपको हमारे यहां चलना होगा।''
''इसके लिए कहना न पड़ेगा दादू; ये तो पहले ही चलने के लिए मुंह धोये बैठे हैं।''
मैंने मन-ही-मन कहा-अनर्थ हो गया! कैसी शरारत की है कंचन ने?
डॉक्टर साहब ने उत्साहित स्वर में कहा-''आपको शायद देश और काल की...।''
''नहीं, नहीं! मैं इन चीजों को कुछ भी नहीं समझता! मुझे समझाने में आपका समय ही बर्बाद होगा?''
''समय! यहां समय का अभाव ही क्या है? अच्छा, आज भोजन हमारे ही यहां करें।''
मैं धन्यवाद करने ही जा रहा था, कि कंचन बोल उठी-
''दादू! हरेक को न्यौता देकर मुझे मुश्किल में डाल देते हो। भला इस जंगल में फिरंगी की दुकान कहां मिलेगी? ये विलायत के 'डिनर' खाने वाली जाती से सम्बन्धित इन्सान हैं। व्यर्थ में अपनी नातिन को बदनाम करना चाहते हो?''
''अच्छा, अच्छा तो कब आपको सुविधा होगी, बताइए- ''वृध्द महाशय पूछ उठे।
''मेरी सुविधा तो कल ही हो सकती है; परन्तु मैं कंचनदेवी को परेशान नहीं करना चाहता। मुझे अनुसंधान के लिए वनों में जाना पड़ता है। वहां जो कुछ भी प्रकृति की देन के द्वारा मिलता है उसे बटोर कर ले आता हूं।''
''दादू! उनकी बातों पर विश्वास मत कीजिए...ये तो ऐसे ही कहते रहते हैं।''
मैंने सोचा यह तो अजीब लड़की है, जो कहता हूं उसी को जड़ से काट देती है। इस प्रकार वार्ता करते-करते हम सब कंचन के मकान की ओर बढ़े चले जा रहे थे कि कंचन हठात् बोल उठी- ''अब आप अपने शिविर को लौट जाइये।''
''क्यों? मैंने तो सोचा था कि आप लोगों को मकान तक छोड़ आऊं।''
''बस, बस, हम खुद ही चले जायेंगे। अस्त-व्यस्त अवस्था में मकान को दिखाकर परिहास का केन्द्र नहीं बनना चाहती। उसे देखते ही मेम साहिब की याद आ जायेगी।''
विवश हो मुझे विलग होना पड़ा। उस अवस्था में मैंने कहा- ''कल आप लोगों के यहां जो मेरा न्योता है, वह मेरे नए नामकरण के लिए है। कल से नवीन माधव नाम का डाक्टर सेन गुप्त अंश छूट जायेगा।''
''तब तो नामवर्त्तन कहिये, नामकरण क्यों कहते हैं?''
''जैसा आप समझें।''
इसके उपरान्त मैं अपने शिविर में लौट आया। उस दिन अनुसन्धान के लिए लाये हुए पदार्थों की मैं परख नहीं कर सका। मेरा मस्तिष्क कंचन के विषय में ही सोचता रहा।
अगले दिन तनिका के तट पर कंचन के साथ हमारी पिकनिक हुई। डॉक्टर साहब बालकों के समान मुझसे पूछ बैठे- ''नवीन, क्या तुम विवाहित हो?'' मैंने उस भावार्थ प्रश्न का तुरन्त ही उत्तर देते हुए कहा- ''अभी तो अविवाहित हूं।'' कंचन को किसी बात से छुटकारा नहीं? वह बोली- ''दादू! अभी तक शब्द तो कन्यापक्ष वालों को सांत्वना देने मात्र के लिए है। उनका कोई यथार्थ अर्थ नहीं।''
''यथार्थ अर्थ नहीं, यह कैसे निश्चय कर लिया?''
''यह एक गणित की उलझन है, फिर भी उच्च गणित कहने से जो वस्तु समझी जाती है, वह यह नहीं है। यह तो पहले से ही सुनने में आया है कि आप छत्तीस साल के बच्चे हैं। इस अर्से में आपसे भी पांच-सात बार कहा जा चुका है कि बेटा बहू लाना चाहती हूं। लेकिन आपने कहा- इससे पहले मैं लोहे के सन्दूक में रुपये लाना चाहता हूं। इसके बाद इस अर्से में आपका सब कुछ हो गया केवल फांसी भर शेष थी। अन्त में प्रांतीय सरकार का बड़ा पद जुट गया तो मां ने फिर कहा- ''अब तो बेटा ब्याह करना होगा। मेरी जिन्दगी के और कितने दिन बाकी हैं?' आपने कहा- 'मेरा जीवन और मेरा विज्ञान एक है, उसे मैं देश के लिए उत्सर्ग करूंगा। मैं अभी ब्याह न करूंगा।' विवश होकर फिर उन्होंने आंखों का पानी पोंछकर चुप्पी साध ली। आपके छत्तीस वर्ष का हिसाब लगाते समय मैंने कहीं गलती की हो तो कहिए, वास्तव में बताइये, संकोच की कोई आवश्यकता नहीं।''
फिर बोली- ''हम लोगों के देश में आप लोग लड़कियों को जीवन-संगिनी के रूप में पाते हैं। विश्व का जिससे कोई प्रयोजन नहीं, किन्तु विदेश में जो लोग विज्ञान के तपस्वी हैं, उनको तो उपयुक्त तपस्विनी ही मिल जाती है- जैसे अध्यापक क्यूरी को सहधार्मिनी मादाम क्यूरी। तो क्या वैसी कोई आपको वहां रहते नहीं मिली?''
कंचन के कहते ही कैथेरिन की बात याद आ गई। लन्दन में रहते समय साथ ही काम किया था। यहां तक कि, मेरी एक रिसर्च की पुस्तक में मेरे नाम के साथ उसका नाम भी जड़ित था। बात माननी पड़ी।
कंचन ने तत्काल ही पूछा- ''उनके साथ आपने विवाह क्यों नहीं किया? वे क्या इसके लिए तैयार नहीं थी?''
''उन्हीं की ओर से प्रस्ताव तो उठा था।''
''तब।''
''मेरा नाम भारतवर्ष का ठहरा, इसलिए...।''
''यानी स्नेह की सफलता आप जैसे साधकों की कामना की वस्तु नहीं। लड़कियों के जीवन का परम लक्ष्य व्यक्तिगत है, और आप जैसे इन्सानों का नैर्यक्तिक।''
इसका उत्तर मुझसे देते न बन पड़ा। मुझे चुप देखकर कंचन पुन: बोली- ''बंगला साहित्य कतिपय आपने नहीं पढ़ा। उसमें यही बात दिखाई गई है कि लड़कियों का व्रत पुरुष को बांधना है और पुरुष का व्रत है उस बंधन को काटकर ऊपर लोक का मार्ग पकड़ना। कच भी देवयानी के अनुरोध की उपेक्षा कर निकल पड़ा था- आप मां का अनुनय न मानकर चल पड़े हैं। एक ही बात हुई। नारी और पुरुष में चिरकाल से चला आने वाला हो, चाहे भले ही अबला क्रन्दन होता रहे। उस क्रन्दन से आप लोग अपनी पूजा का नैवेद्य सजा लीजिए। देवता के उद्देश्य से ही नैवेद्य की भेंट होती है; लेकिन देवता निरासक्त ही रहते हैं।''
कंचन ने फिर कहा- ''देवयानी ने कच को क्या श्राप दिया था, जानते हैं, नवीन बाबू?''
''नहीं।''
''अपने ज्ञान-साधन का फल आप स्वयं न सोच सकेंगे। हां, दूसरों को दान कर सकेंगे।'' ''मुझे यह बात कुछ अजीब-सी लगती है। यदि यह श्राप आज कोई विदेशी लोगों को देता, तो वह बच जाता। विश्व की सामग्री को अपनी सामग्री के समान व्यवहार करने की वजह से ही यूरोप वाले लालच के द्वार पर मरते हैं।''
उस दिन जो बातें हुई वे केवल हास्य-व्यंग्य ही नहीं थीं। उनमें युध्द की ओर संकेत था। कंचन के साथ अब मेरा सम्बन्ध सहज हो आया था, इस पर भी मैं कंचन के सम्मुख खड़े होकर उसकी चरम अभिलाषा की थाह पाने का कोई उपाय खोज नहीं पाया।
हां, अवश्य एक दिन पिकनिक के समय यह सुयोग मिल गया। उस समय डॉक्टर साहब शिवालय के खंडहर की सीढ़ी पर बैठकर रसायन-शास्त्र की कोई नई आई हुई पोथी पढ़ रहे थे। एक आबनूस के पेड़ की झाड़ी में बैठकर कंचन अचानक कह उठी-''इस महाकाल के वन में एक अंधी प्राण शक्ति है, उससे भयग्रस्त हूं।''
कंचन कहती गई- ''पुराने भवनों के दरार से लुक-छिपकर पीपल का अंकुर निकलता है, और फिर धीरे-धीरे अपनी जड़ों से उसे बुरी तरह जकड़ लेता है। यह भी वैसा ही है। दादू के साथ यही बात हो रही थी। दादू कह रहे थे, बस्ती से बहुत दिनों तक दूर रहने से प्रकृति के अभाव से मानव का चरित्र दुर्बल हो जाता है और आदमी प्राणी प्रकृति का असर प्रखर हो उठता है।''
मैंने उत्तर दिया- ''बताता हूं। मेरी बात को भली-भांति सोच देखियेगा। मेरा विचार यह है कि ऐसे अवसरों पर मानव का संग भीतर और बाहर से मिलना चाहिए, जिसका प्रभाव मानव प्रकृति को पूर्ण कर सके। जब तक यह नहीं होगा तब तक अंध शक्ति से पराजित ही होना पड़ेगा। काश आप मामूली...''
''हां, हां कहिये, संकोच मत कीजिये।''-कंचन ने शीघ्रता से कहा।
''यह तो जानते ही हैं कि मैं वैज्ञानिक हूं अत: जो कहने जा रहा हूं उसे व्यक्तिगत आसक्ति से रहित होकर ही कहूंगा। आपने एक दिन भवतोष को बहुत स्नेह से देखा था, क्या आज भी उसे उसी प्रकार...''
''समझ लीजिए, नहीं करती...तब।''
''मैंने ही आपके मन को उधर से हटाया है।''
''सम्भव हो सकता है; लेकिन आपने ही नहीं, बल्कि इस अंध शक्ति ने भी। इसलिए मैं इस हटने को श्रध्दा की दृष्टि से नहीं देखती।''
''ऐसा क्यों?''
''दीर्घ काल के प्रयास से मानवचित्र शक्ति में अपने आदर्श की रचना करता है, प्राण शक्ति की अंधता उस आदर्श को तोड़ देती है। आपके प्रति जो मेरा प्रेम है, वह उसी अंध शक्ति के आक्रमण का फल है।''
''नारी होकर भी आप प्रेम पर ऐसा अपवाद मढ़ती हैं?''
''नारी होने के कारण ही ऐसा कह रही हूं। प्रेम का आदर्श हमारे लिए पूजा की सामग्री है। उसी को सतीत्व कहते हैं। सतीत्व एक आदर्श है। यह सामग्री वन की प्रकृति की नहीं है, मानवी की है। इस निर्जन में इतने दिनों से इसी आदर्श की पूजा कर रही थी। सारे आघातों को सहन और धोखा खाने के बाद भी उसे बचा सकी, तो मेरी पवित्रता भी नहीं जायेगी।
''क्या भवतोष के लिए अब भी श्रध्दा का स्थान है?''
''नहीं।''
''उसके पास जाना चाहती हो।''
''नहीं।''
''तो फिर।''
''कुछ भी नहीं।''
''मैं आशय नहीं समझा।''
''आप समझ भी नहीं सकेंगे। आपकी संपत्ति ज्ञान है, उच्चतर शिखर पर वह भी इम्पर्सनल है। नारी संपत्ति हृदय की संपत्ति है। यदि उसका सब कुछ चला जाये, वह सब कुछ जो बाहरी है, जिसे स्पर्श किया जा सकता है तब भी उस प्रेम में वह वस्तु बच रहती है, जो कि इम्पर्सनल है।''
''वाद-विवाद में समय नष्ट न कीजिए। मुझे कुछ ही दिनों में खोज करने के अभिप्राय से अन्यत्र कहीं चला जाना होगा किन्तु...।''
''फिर गये क्यों नहीं?''
'आपसे...।''
तभी कंचन ने पुकारा- ''दादू!''
डॉक्टर साहब अपना पढ़ना-लिखना छोड़कर उठ आये और मधुर स्नेह के स्वर में बोले- ''क्या है दीदी?''
''आपने उस दिन कहा था न कि मनुष्य का सत्य उसी की तपस्या के भीतर से अभिव्यक्त हुआ है। उसकी अभिव्यक्ति प्राणी शास्त्र से समझी जाने वाली अभिव्यक्ति नहीं है?''
''हां बिल्कुल ठीक...।''
''दादू तो फिर आज अपनी और आपकी बात का निर्णय कर दूं। कई दिनों से मस्तिष्क उथल-पुथल का केन्द्र बना हुआ है।''
मैं उठ खड़ा हुआ, बोला- ''तो मैं चलूं।''
''नहीं! आप बैठिये। दादू, आपका वही पद फिर खाली हुआ है और सेक्रटरी ने पुन: आपको बुलवाया भी है।''
''हां तो फिर...।''
''आपको उस पद को स्वीकार करना होगा...अति शीघ्र वहीं लौट जाना होगा।''
डॉक्टर साहब बेचारे हत्बुध्दि होकर कंचन के मुंह की ओर ताकते रहे। कंचन बोली-''अच्छा, अब समझी, आप इसी सोच में पड़े हैं कि मेरी क्या गति होगी? यदि अहंकार की मात्रा बहुत न बढ़ती हो, तो आपको यह बात स्वीकार करनी ही होगी कि मेरे बिना आपका एक दिन भी नहीं चल सकता। मेरी अनुपस्थिति में तो पंद्रहवीं आश्विन को आप पंद्रहवीं अक्टूबर समझ बैठते हो। जिस दिन घर में अपने सहयोगी अध्यापक को भोजन के लिए आमंत्रित करते हो, उसी दिन लायब्रेरी का द्वार बन्द करके कोई 'निदारूण ईक्वेशन' सुलझाने में लग जाते हो। नवीन बाबू सोचते होंगे कि मैं बात बढ़ा-चढ़ाकर कह रही हूं।''
''आज ऐसी अशुभ बातें...।''
''सब अभी खत्म हो जायेंगी। आप चलें तो मेरे साथ अपने काम पर, छुटी हुई गाड़ी फिर लौट आयेगी।''
डॉक्टर साहब मेरी ओर देखकर बोले-''तुम्हारी क्या सलाह है नवीन?''
मैं क्षण भर स्तब्ध रहकर बोला-''कंचनदेवी से अधिक अच्छा परामर्श कोई नहीं दे सकता।''
कंचन ने उठकर मेरे चरण छूकर प्रणाम किया। मैं संकुचित होकर पीछे हट आया। कंचन बोली- ''संकोच न कीजिये। आपकी तुलना में मैं कुछ भी नहीं हूं... यह बात किसी दिन साफ हो जायेगी? आज आपसे यहीं अन्तिम विदा लेती हूं, जाने से पूर्व अब भेंट न होगी।''
''यह कैसी बात कह रही हो, दीदी?''-डॉक्टर साहब ने पूछा।
''दादू...'' इतना ही कह सकी कंचन।
मैंने उसी क्षण डॉक्टर साहब की पग-धूलि का स्पर्श किया। उन्होंने छाती से लगाकर कहा- ''मैं जानता हूं नवीन कि तुम्हारी कीर्ति का पथ तुम्हारे सामने प्रशस्त है।''
अपने स्थान पर लौटकर पहला रिकार्ड निकाला। उसे देखते ही मन में सहसा आनन्द उमड़ आया। समझा मुक्ति इसी को कहते हैं। संध्या-बेला में दिन भर का काम समाप्त करके बरामदे में आते ही अनुभव हुआ... पंछी पिंजरे से तो निकल आया है, किन्तु उसके पांवों में जंजीर की एक कड़ी अब भी उलझी हुई है... हिलते-हिलते वह बज उठती है।

Friday, April 17, 2026

सत्संग........(धर्मेंद्र राजमंगल)

 कुछ दिनों से गांव में हर रविवार के दिन एक सत्संग मंडली आना शुरू हो गई थी. मंडली में कुलमिला कर 3 लोग थे, एक मंडली के प्रमुख गुरु बाबा और बाकी 2 बूढ़ी बाईजी. गुरु बाबा की उम्र 45 साल के आसपास थी, लेकिन तंदुरुस्ती उन्हें जवान दिखाती थी. शुरुआत में गांव में केवल मीना का ही एक घर था, जिस में गुरु बाबा सत्संग करने आते थे, लेकिन कुछ ही दिनों में आधे गांव की औरतें गुरु बाबा की भक्त हो गईं. गुरु बाबा इन दिनों शहर के किसी मंदिर में रहते थे और रविवार का दिन आते ही इस गांव में मीना के घर सत्संग करने आ पहुंचते थे.


मीना का गुरु बाबा से परिचय अपने मायके में सत्संग के  दौरान हुआ था. उसी वक्त मीना ने गुरु बाबा की वाणी से प्रभावित हो कर उन्हें इस गांव में आने का न्योता दे डाला था. जिस दिन गुरु बाबा मीना के घर आए, उस दिन मीना ने अपनी शेखी बघारने के लिए पड़ोस की कुछ औरतों को भी वहां बुला लिया था. मीना के घर पर पहले दिन ही गुरु बाबा ने ऐसा सत्संग किया कि सारी औरतें उन की मुरीद हो गईं. धीरेधीरे सब औरतों ने उन्हें अपना गुरु मान कर गुरु मंत्र भी ले लिया. गुरु बाबा केवल रविवार के दिन ही आते थे. यह बात अब उन के भक्तों को खासा अखरती थी.

एक बार रविवार आने से पहले ही औरतों में इस बात पर चर्चा हुई कि गुरु बाबा को गांव के बाहर बने मंदिर में जगह दे दी जाए, जिस से उन का सत्संग रोज सुनने को मिल जाया करे. सभी औरतें इस बात पर एकमत थीं. रविवार के दिन जब गुरु बाबा गांव में सत्संग के लिए आए, तो उन औरतों ने उन के सामने यह प्रस्ताव रख दिया. गुरु बाबा कुछ कहते, उस से पहले ही उन के साथ आने वाली बाईजी ने इस गांव के मंदिर में रुकने से मना कर दिया. वे कहती थीं कि साधुसंन्यासी को लालच के चलते कहीं नहीं रुकना चाहिए. लेकिन बाईजी की सुनता कौन था. औरतों को तो वैसे ही बाईजी से कोई मतलब न था. वे तो गुरु बाबा के साथ आती थीं, इसलिए उन की इज्जत होती थी.

गुरु बाबा इस बात को सुन कर जोश में थे, लेकिन बाईजी की वजह से कुछ कह न सके. वे आज जिस जगह पर थे, वहां तक लाने में बाईजी का बहुत बड़ा योगदान था. पर गांव की औरतों द्वारा किया गया अनुरोध गुरु बाबा को बाईजी के खिलाफ बगावत करने के लिए मजबूर कर गया. जब गुरु बाबा ने बाईजी से अपनी दिली इच्छा जाहिर की, तो दोनों बाईजी उन से नाराज हो गईं और फिर कभी इस गांव में न आने को कह कर अपने आश्रम लौट गईं. गुरु बाबा को इस बात से कोई फर्क न पड़ा. उन्हें इस गांव की औरतों से जो आश्वासन मिला था, वह बाईजी के साथ से कई गुना बड़ा था. उसी दिन औरतों ने खुद जा कर गांव के बाहर बने मंदिर के कमरे को झाड़पोंछ कर गुरु बाबा के रहने के लिए तैयार कर दिया.

शाम तक गुरु बाबा के लिए मंदिर में बढि़या भोजन बना कर भेज दिया गया. आज सालों बाद बाबाजी के लिए किसी ने इतना स्वादिष्ठ खाना भेजा था, जबकि बाईजी के आश्रम में तो हमेशा संन्यासियों वाला खाना ही मिलता था. गुरु बाबा ने फैसला किया कि अब वे इसी गांव में रहेंगे. यह बात जब औरतों को पता चली, तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. अब हर रोज मंदिर में पूजा होने लगी थी. लोग इस बात से खुश हो कर मंदिर में चढ़ावा चढ़ाने लगे थे. मर्द भी यह सोच कर खुश थे कि चलो मंदिर में गुरु बाबा के रहने से वहां का सूनापन खत्म हो जाएगा.

अब मीना के घर के बजाय मंदिर की धर्मशाला में ही सत्संग होना शुरू हो गया था. बड़ी जातियों के साथसाथ छोटी कही जाने वाली जातियों के लोग भी गुरु बाबा का सत्संग सुनने आने लगे थे.गुरु बाबा के पास चढ़ावे के पैसों का भी ढेर लगता जा रहा था. पिछड़ी जाति की एक लड़की रजनी को गुरु बाबा का सत्संग सुनने की ऐसी लत पड़ी कि घर के सब काम छोड़ कर वह रोज सत्संग में आ बैठती थी.  रजनी की उम्र 19 साल थी, लेकिन जिस दिन उस ने गुरु बाबा का सत्संग सुना, तो भक्ति से सराबोर हो गई. घर में बूढ़ी दादी के अलावा कोई और नहीं था, जो उसे रोकता या टोकता. मांबाप उसे बचपन में ही छोड़ कर चल बसे थे.

गुरु बाबा की खातिरदारी और रोब देख कर उस के मन में खयाल आता था कि वह भी साध्वी हो जाए. लेकिन उस की राह में एक अड़चन थी कि वह पिछड़ी जाति की थी. भला पिछड़ी जाति की लड़की को कौन साध्वी मानेगा? यह खयाल मन में दबाए रजनी रोज गुरु बाबा का सत्संग सुनने आती रही. सर्दियों के दिन थे. गुरु बाबा ने आग जलाने के लिए उपले और लकडि़यों का इंतजाम करने की बात भक्तों से कही, तो रजनी उछल कर बोल पड़ी कि इन सब चीजों का इंतजाम वह खुद कर देगी.गुरु बाबा की नजर रजनी पर पड़ी, तो भरे बदन की ठीकठाक दिखने वाली रजनी उन के दिल को भा गई. लेकिन चाह कर भी वे कुछ न कह सके.

शाम के वक्त रजनी एक गठरी में उपले और लकड़ी भर कर मंदिर जा पहुंचीं. उस वक्त मंदिर में गुरु बाबा के अलावा कोई और नहीं था. रजनी ने सिर से गठरी उतारी ही थी कि गुरु बाबा मंदिर के  कमरे से बाहर निकल आए. रजनी ने गुरु बाबा को देखा तो हाथ जोड़ कर प्रणाम कर लिया. गुरु बाबा ने इधरउधर नजर घुमाई, फिर रजनी के सिर, कंधे और गाल पर बड़े प्यार से हाथ फेरा.
गुरु बाबा जानते थे कि रजनी पिछड़ी जाति की है, लेकिन उन की वासना को जातबिरादरी की दीवार कतई मंजूर न थी. गुरु बाबा खीसें निपोरते हुए बोले, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’

वह बोली, ‘‘जी... रजनी.’’

गुरु बाबा फिर से बोले, ‘‘और कौनकौन लोग हैं घर में?’’

रजनी ने उसी अंदाज में जवाबदिया, ‘‘मैं और मेरी दादी हैं... और कोई नहीं.’’

गुरु बाबा मन ही मन खुश हो उठे और बोले, ‘‘कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा. किसी बात की चिंता मत करो. चलो, तुम्हारी शादी में हम मदद कर देंगे.’’

रजनी शरमा कर बोली, ‘‘बाबाजी, मुझे अभी शादी नहीं करनी. मैं तो साध्वी बनना चाहती हूं.’’

गुरु बाबा खुश हो कर बोले, ‘‘अरे वाह, क्या बढि़या विचार है. तो फिर बन क्यों नहीं जातीं साध्वी? देर किस बात की है?’’

रजनी शरमाते हुए बोली, ‘‘बाबाजी, मैं पिछड़ी जाति की हूं न, इसलिए सोच कर रह जाती हूं.’’

गुरु बाबा खुद इस बात के खिलाफ थे कि कोई छोटी जाति का आदमी संत बने, लेकिन रजनी को पाने के लिए वे बेफिक्र हो कर बोले, ‘‘ऐसा कौन बोला? हम बनाएंगे तुम्हें साध्वी. आओ, अंदर बैठ कर बातें करते हैं.’’ रजनी गुरु बाबा के कमरे में जाने से थोड़ा हिचक रही थी, लेकिन उन के दोबारा कहने पर वह अंदर चली गई. अंदर कमरे में गुरु बाबा के लिए सुखसुविधा का हर सामान मौजूद था. कमरे में पड़े तख्त पर गुरु बाबा ने खुद बैठते हए रजनी को भी बिठा लिया और उस के शरीर पर जहांतहां हाथ फिरा कर बोले, ‘‘देखो रजनी, हम तुम्हें साध्वी तो बना सकते हैं, लेकिन यह बनना इतना आसान नहीं होता. इस के लिए तुम्हें बहुत मेहनत करनी पड़ेगी. पहले शिष्या बन कर मेरी सेवा करनी पड़ेगी.

‘‘मैं जो भी कहूंगा, वह आंख मूंद कर करते रहना होगा, तब जा कर तुम साध्वी बन पाओगी. अगर यह सब मंजूर हो तो बताओ, फिर मैं इस बारे में सोचूं भी.’’

रजनी को दुनियादारी की समझ नहीं थी. संतगीरी की चमक ने उसे दीवाना बना दिया था. इस सब के लिए वह कुछ भी दांव पर लगाने को तैयार थी. रजनी बोली, ‘‘बाबाजी, आप जो कहो मैं वही करने को तैयार हूं. आप मेरी जान मांगो, तो वह भी मैं दे दूं. बस, आप मुझे साध्वी बना दो.’’ रजनी का साध्वी बनने के  प्रति इतना जोश देख कर गुरु बाबा खुश हो उठे. अब उन्हें अपनी इच्छा पूरी करने से कोई नहीं रोक सकता था. गुरु बाबा ने रजनी को अपने करीब किया और उस का मुंह चूम लिया. रजनी को थोड़ा अटपटा तो लगा, लेकिन इसे उन का प्यार समझ कर सह गई. गुरु बाबा ने उठ कर कमरे का दरवाजा बंद कर लिया. रजनी के दिल की धड़कनें बढ़ गईं, लेकिन कुछ कहने की हिम्मत न कर सकी.

गुरु बाबा ने रजनी को अपनी बांहों में भरा और चूम लिया. रजनी का सारा जिस्म डर से कांप उठा, मुंह से निकला, ‘‘बाबाजी, यह आप...’’ रजनी विरोध में बस इतना ही कह पाई, क्योंकि गुरु बाबा ने उसे यह बोल कर चुप कर दिया, ‘‘रजनी, हम ने तुम से क्या कहा था. तुम तो कहती थीं कि जान भी दे दूंगी. तुम्हें साध्वी बनना है या नहीं?’’

रजनी चुप हो कर सब सहती गई. बाबा अपनी हवस मिटा चुके थे. उन्होंने एक बार फिर से रजनी को साध्वी बनाने का आश्वासन दे कर घर भेज दिया. रजनी अपनी इज्जत लुटा कर घर को चल दी. उसे बुरा तो लग रहा था, लेकिन मन में साध्वी बनने का खयाल तसल्ली दिए जा रहा था. अगले दिनों में रजनी इसी तरह गुरु बाबा के पास आती रही और बाबा इसी तरह उस का शोषण करते रहे. एक दिन रजनी ने गुरु बाबा से साध्वी बनने की जिद कर दी. बाबा रजनी को और ज्यादा दिनों तक टाल नहीं सके. उन्होंने अगले ही दिन रजनी को गेरुए कपड़े मंगवा कर दे दिए और विधिविधान से उसे साध्वी बना दिया. रजनी के साध्वी बनने की बात सुन कर गांव के लोगों ने इस बात पर कड़ा एतराज दर्ज किया, लेकिन गुरु बाबा के आगे उन की एक न चली. कुछ दिन तक तो रजनी साध्वी के वेश में रात के वक्त अपने घर पर ही रही, लेकिन जल्दी ही गुरु बाबा के बारबार कहने पर उस के साथ ही मंदिर के दूसरे कमरे में रहने लगी.

गुरु बाबा के भक्तों को तो इस बात में कोई खराबी न दिखती थी, क्योंकि उन्हें अपने गुरु बाबा की नीयत पर पूरा भरोसा था. गांव के छिछोरे लड़के, जो दिनभर रजनी को ताका करते थे, वे अब दिनभर मंदिर में डेरा जमाए रहते. गुरु बाबा ने इस बात का फायदा भी उठाना शुरू कर दिया था. वे अब इन लोगों के लिए साध्वी रजनी का अलग से प्रवचन रखवाते और इन लोगों से मनमाना पैसा भी वसूलते थे. धीरेधीरे प्रवचन छिछोरी बातों के प्रवचन में तबदील होता चला गया, साथ ही गुरु बाबा के पास पैसों की बरसात भी होती चली गई. एक शाम एक छिछोरे लड़के ने कैमरे से चुपके से गुरु बाबा और रजनी का आपत्तिजनक फोटो खींच लिया. जब गुरु बाबा को इस बात की खबर लगी, तो उन के होश उड़ गए. उन्होंने तुरंत उस लड़के को बुलाया और उस के सामने गिड़गिड़ाने लगे कि यह बात वह किसी को न बताए, इस के बदले वह उस लड़के को मुंहमांगी रकम भी देने को तैयार हो गए.

लड़का चालाक था. उसे पता था कि इस बाबा ने खूब कमाया है. उस ने खींचे हुए फोटो वापस कर गुरु बाबा से मोटी रकम ऐंठ ली. यह रकम इतनी मोटी थी कि गुरु बाबा की जमापूंजी खत्म सी हो गई. सत्संग के नाम से कमाया गया पैसा गुरु बाबा के शौक और ऐयाशियों को छिपाने के काम आ रहा था. गुरु बाबा ने पैसा कम होते देखा, तो भक्तों से और ज्यादा दान करने के लिए बोल दिया. लड़के को पैसा दे कर गुरु बाबा और साध्वी रजनी अभी चैन की सांस भी न ले पाए थे कि और भी लड़के इन लोगों के अश्लील फोटो लिए घूमने लगे. यह सब देख गुरु बाबा अधमरे हो गए. उन्होंने आननफानन सभी लड़कों को बुला कर इस सब को बंद करने की प्रार्थना कर डाली. गुरु बाबा ने इन सभी लड़कों को धर्म के नाम पर जम कर लूटा था, फिर ये लोग बाबा को इतनी आसानी से कैसे छोड़ देते. उन्होंने गुरु बाबा के सामने शर्त रख दी कि अगर वे अपनी साध्वी से उन लोगों को मस्ती करने देंगे, तो कोई कुछ नहीं कहेगा.

अब गुरु बाबा क्या करते, उन्होंने अपनी इज्जत बचाने की खातिर जैसेतैसे साध्वी रजनी को इस बात के लिए मना लिया. अब हालत यह हो गई कि भगवान के मंदिर के  ठीक बगल में दिनभर वासना का खेल चलने लगा. रजनी साध्वी इसलिए बनी थी कि आराम से जिंदगी गुजार सकेगी, लेकिन यहां तो उस की जिंदगी ही नरक सी हो गई थी. गांव में इस बात की चर्चा जोरों पर थी, लेकिन गुरु बाबा के अंधभक्त लोग अब भी इस बात पर यकीन न करते थे. लेकिन अब कुछ घरों की औरतों ने सत्संग में आना बंद कर दिया था. गुरु बाबा की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही थीं. एक रात गुरु बाबा चुपके से साध्वी रजनी को ले कर मंदिर से भाग गए. सोचते थे, अब दूर कहीं जा कर सत्संग किया करेंगे, जहां साध्वी रजनी उन की धर्मपत्नी के तौर पर रहा करेगी. गुरु बाबा और साध्वी रजनी के मंदिर से भागते ही लोगों को पूरी कहानी समझ आ गई. लेकिन अब भी उन के भक्तों को लगता था कि गुरु बाबा जरूर किसी और वजह से इस तरह गए होंगे, क्योंकि जिस तरह से गुरु बाबा सत्संग में प्रवचन देते थे, उस हिसाब से वे ऐसा कर ही नहीं सकते थे. 

Friday, April 10, 2026

चीफ क़ी दावत .............(भीष्म साहनी)

 शामनाथ और उनकी धर्मपत्नी को पसीना पोंछने की फुर्सत न थी। पत्नी ड्रेसिंग गाउन पहने, उलझे हुए बालों का जूडा बनाए मुँह पर फैली हुई सुर्खी और पाउडर को मले और मिस्टर शामनाथ सिगरेट पर सिगरेट फूंकते हुए चीजों की फेहरिस्त हाथ में थामे , एक कमरे से दूसरे कमरे में आ – जा रहे थे।

आखिर पांच बजते-बजते तैयारी मुकम्मल होने लगी। कुर्सियां, मेज, तिपाइयां, नैपकिन, फूल, सब बरामदे में पहुंच गए। ड्रिंक का इन्तजाम बैठक में कर दिया गया। अब घर का फालतू सामान अलमारियों के पीछे और पलंगों के नीचे छिपाया जाने लगा। तभी शामनाथ के सामने सहसा एक अडचन खडी हो गई, मां का क्या होगा?
इस बात की ओर न उनका और न उनकी कुशल गृहिणी का ध्यान गया था। मिस्टर शामनाथ, श्रीमती की ओर घूमकर अंग्रेजी में बोले - मां का क्या होगा?
श्रीमती काम करते-करते ठहर गई, और थोडी देर तक सोचने के बाद बोलीं - इन्हें पिछवाडे ऌनकी सहेली के घर भेज दो रात-भर बेशक वहीं रहें। कल आ जाएं।
शामनाथ सिगरेट मुंह में रखे, सिकुडी आंखों से श्रीमती के चेहरे की ओर देखते हुए पल-भर सोचते रहे, फिर सिर हिलाकर बोले - नहीं, मैं नहीं चाहता कि उस बुढिया का आना-जाना यहां फिर से शुरू हो। पहले ही बडी मुश्किल से बन्द किया था। मां से कहें कि जल्दी ही खाना खा के शाम को ही अपनी कोठरी में चली जाएं। मेहमान कहीं आठ बजे आएंगे इससे पहले ही अपने काम से निबट लें।
सुझाव ठीक था। दोनों को पसन्द आया। मगर फिर सहसा श्रीमती बोल उठीं - जो वह सो गयीं और नींद में खर्राटे लेने लगीं, तो? साथ ही तो बरामदा है, जहां लोग खाना खाएंगे।
तो इन्हें कह देंगे कि अन्दर से दरवाजा बन्द कर लें। मैं बाहर से ताला लगा दूंगा। या मां को कह देता हूं कि अन्दर जाकर सोयें नहीं, बैठी रहें, और क्या?
और जो सो गई, तो? डिनर का क्या मालूम कब तक चले। ग्यारह-ग्यारह बजे तक तो तुम ड्रिंक ही करते रहते हो।
शामनाथ कुछ खीज उठे, हाथ झटकते हुए बोले - अच्छी-भली यह भाई के पास जा रही थीं। तुमने यूंही खुद अच्छा बनने के लिए बीच में टांग अडा दी!
वाह! तुम मां और बेटे की बातों में मैं क्यों बुरी बनूं? तुम जानो और वह जानें।
मिस्टर शामनाथ चुप रहे। यह मौका बहस का न था, समस्या का हल ढूंढने का था। उन्होंने घूमकर मां की कोठरी की ओर देखा। कोठरी का दरवाजा बरामदे में खुलता था। बरामदे की ओर देखते हुए झट से बोले - मैंने सोच लिया है, - और उन्हीं कदमों मां की कोठरी के बाहर जा खडे हुए। मां दीवार के साथ एक चौकी पर बैठी, दुपट्टे में मुंह-सिर लपेटे, माला जप रही थीं। सुबह से तैयारी होती देखते हुए मां का भी दिल धडक़ रहा था। बेटे के दफ्तर का बडा साहब घर पर आ रहा है, सारा काम सुभीते से चल जाय।
मां, आज तुम खाना जल्दी खा लेना। मेहमान लोग साढे सात बजे आ जायेंगे।
मां ने धीरे से मुंह पर से दुपट्टा हटाया और बेटे को देखते हुए कहा, आज मुझे खाना नहीं खाना है, बेटा, तुम जो जानते हो, मांस-मछली बने, तो मैं कुछ नहीं खाती।
जैसे भी हो, अपने काम से जल्दी निबट लेना।
अच्छा, बेटा।
और मां, हम लोग पहले बैठक में बैठेंगे। उतनी देर तुम यहां बरामदे में बैठना। फिर जब हम यहां आ जाएं, तो तुम गुसलखाने के रास्ते बैठक में चली जाना।
मां अवाक बेटे का चेहरा देखने लगीं। फिर धीरे से बोलीं - अच्छा बेटा।
और मां आज जल्दी सो नहीं जाना। तुम्हारे खर्राटों की आवाज दूर तक जाती है।
मां लज्जित-सी आवाज में बोली - क्या करूं, बेटा, मेरे बस की बात नहीं है। जब से बीमारी से उठी हूं, नाक से सांस नहीं ले सकती।
मिस्टर शामनाथ ने इन्तजाम तो कर दिया, फिर भी उनकी उधेड-बुन खत्म नहीं हुई। जो चीफ अचानक उधर आ निकला, तो? आठ-दस मेहमान होंगे, देसी अफसर, उनकी स्त्रियां होंगी, कोई भी गुसलखाने की तरफ जा सकता है। क्षोभ और क्रोध में वह झुंझलाने लगे। एक कुर्सी को उठाकर बरामदे में कोठरी के बाहर रखते हुए बोले - आओ मां, इस पर जरा बैठो तो।
मां माला संभालतीं, पल्ला ठीक करती उठीं, और धीरे से कुर्सी पर आकर बैठ गई।
यूं नहीं, मां, टांगे ऊपर चढाकर नहीं बैठते। यह खाट नहीं हैं।
मां ने टांगे नीचे उतार लीं।
और खुदा के वास्ते नंगे पांव नहीं घूमना। न ही वह खडाऊं पहनकर सामने आना। किसी दिन तुम्हारी यह खडाऊ उठाकर मैं बाहर फेंक दूंगा।
मां चुप रहीं।
कपडे क़ौनसे पहनोगी, मां?
जो है, वही पहनूंगी, बेटा! जो कहो, पहन लूं।
मिस्टर शामनाथ सिगरेट मुंह में रखे, फिर अधखुली आंखों से मां की ओर देखने लगे, और मां के कपडों की सोचने लगे। शामनाथ हर बात में तरतीब चाहते थे। घर का सब संचालन उनके अपने हाथ में था। खूंटियां कमरों में कहां लगायी जायें, बिस्तर कहां पर बिछे, किस रंग के पर्दे लगायें जाएं, श्रीमती कौन-सी साडी पहनें, मेज किस साइज की हो ..शामनाथ को चिन्ता थी कि अगर चीफ का साक्षात मां से हो गया, तो कहीं लज्जित नहीं होना पडे। मां को सिर से पांव तक देखते हुए बोले - तुम सफेद कमीज और सफेद सलवार पहन लो, मां। पहन के आओ तो, जरा देखूं।
मां धीरे से उठीं और अपनी कोठरी में कपडे पहनने चली गयीं।
यह मां का झमेला ही रहेगा, उन्होंने फिर अंग्रेजी में अपनी स्त्री से कहा - कोई ढंग की बात हो, तो भी कोई कहे। अगर कहीं कोई उल्टी-सीधी बात हो गयी, चीफ को बुरा लगा, तो सारा मजा जाता रहेगा।
मां सफेद कमीज और सफेद सलवार पहनकर बाहर निकलीं। छोटा-सा कद, सफेद कपडों में लिपटा, छोटा-सा सूखा हुआ शरीर, धुंधली आंखें, केवल सिर के आधे झडे हुए बाल पल्ले की ओट में छिप पाये थे। पहले से कुछ ही कम कुरूप नजर आ रही थीं।
चलो, ठीक है। कोई चूडियां-वूडियां हों, तो वह भी पहन लो। कोई हर्ज नहीं।
चूडियां कहां से लाऊं, बेटा? तुम तो जानते हो, सब जेवर तुम्हारी पढाई में बिक गए।
यह वाक्य शामनाथ को तीर की तरह लगा। तिनककर बोले - यह कौन-सा राग छेड दिया, मां! सीधा कह दो, नहीं हैं जेवर, बस! इससे पढाई-वढाई का क्या तअल्लुक है! जो जेवर बिका, तो कुछ बनकर ही आया हूं, निरा लंडूरा तो नहीं लौट आया। जितना दिया था, उससे दुगना ले लेना।
मेरी जीभ जल जाय, बेटा, तुमसे जेवर लूंगी? मेरे मुंह से यूंही निकल गया। जो होते, तो लाख बार पहनती!
साढे पांच बज चुके थे। अभी मिस्टर शामनाथ को खुद भी नहा-धोकर तैयार होना था। श्रीमती कब की अपने कमरे में जा चुकी थीं। शामनाथ जाते हुए एक बार फिर मां को हिदायत करते गए - मां, रोज की तरह गुमसुम बन के नहीं बैठी रहना। अगर साहब इधर आ निकलें और कोई बात पूछें, तो ठीक तरह से बात का जवाब देना।
मैं न पढी, न लिखी, बेटा, मैं क्या बात करूंगी। तुम कह देना, मां अनपढ है, कुछ जानती-समझती नहीं। वह नहीं पूछेगा।
सात बजते-बजते मां का दिल धक-धक करने लगा। अगर चीफ सामने आ गया और उसने कुछ पूछा, तो वह क्या जवाब देंगी। अंग्रेज को तो दूर से ही देखकर घबरा उठती थीं, यह तो अमरीकी है। न मालूम क्या पूछे। मैं क्या कहूंगी। मां का जी चाहा कि चुपचाप पिछवाडे विधवा सहेली के घर चली जाएं। मगर बेटे के हुक्म को कैसे टाल सकती थीं। चुपचाप कुर्र्सी पर से टांगे लटकाये वहीं बैठी रही।
एक कामयाब पार्टी वह है, जिसमें ड्रिंक कामयाबी से चल जाएं। शामनाथ की पार्टी सफलता के शिखर चूमने लगी। वार्तालाप उसी रौ में बह रहा था, जिस रौ में गिलास भरे जा रहे थे। कहीं कोई रूकावट न थी, कोई अडचन न थी। साहब को व्हिस्की पसन्द आई थी। मेमसाहब को पर्दे पसन्द आए थे, सोफा-कवर का डिजाइन पसन्द आया था, कमरे की सजावट पसन्द आई थी। इससे बढक़र क्या चाहिए। साहब तो ड्रिंक के दूसरे दौर में ही चुटकुले और कहानियां कहने लग गए थे। दफ्तर में जितना रोब रखते थे, यहां पर उतने ही दोस्त-परवर हो रहे थे और उनकी स्त्री, काला गाउन पहने, गले में सफेद मोतियों का हार, सेन्ट और पाउडर की महक से ओत-प्रोत, कमरे में बैठी सभी देसी स्त्रियों की आराधना का केन्द्र बनी हुई थीं। बात-बात पर हंसती, बात-बात पर सिर हिलातीं और शामनाथ की स्त्री से तो ऐसे बातें कर रही थीं, जैसे उनकी पुरानी सहेली हों।
और इसी रो में पीते-पिलाते साढे दस बज गए। वक्त गुजरते पता ही न चला।
आखिर सब लोग अपने-अपने गिलासों में से आखिरी घूंट पीकर खाना खाने के लिए उठे और बैठक से बाहर निकले। आगे-आगे शामनाथ रास्ता दिखाते हुए, पीछे चीफ और दूसरे मेहमान।
बरामदे में पहुंचते ही शामनाथ सहसा ठिठक गए। जो दृश्य उन्होंने देखा, उससे उनकी टांगें लडख़डा गई, और क्षण-भर में सारा नशा हिरन होने लगा। बरामदे में ऐन कोठरी के बाहर मां अपनी कुर्सी पर ज्यों-की-त्यों बैठी थीं। मगर दोनों पांव कुर्सी की सीट पर रखे हुए, और सिर दायें से बायें और बायें से दायें झूल रहा था और मुंह में से लगातार गहरे खर्राटों की आवाजें आ रही थीं। जब सिर कुछ देर के लिए टेढा होकर एक तरफ को थम जाता, तो खर्राटें और भी गहरे हो उठते। और फिर जब झटके-से नींद टूटती, तो सिर फिर दायें से बायें झूलने लगता। पल्ला सिर पर से खिसक आया था, और मां के झरे हुए बाल, आधे गंजे सिर पर अस्त-व्यस्त बिखर रहे थे।
देखते ही शामनाथ क्रुध्द हो उठे। जी चाहा कि मां को धक्का देकर उठा दें, और उन्हें कोठरी में धकेल दें, मगर ऐसा करना सम्भव न था, चीफ और बाकी मेहमान पास खडे थे।
मां को देखते ही देसी अफसरों की कुछ स्त्रियां हंस दीं कि इतने में चीफ ने धीरे से कहा - पुअर डियर!
मां हडबडा के उठ बैठीं। सामने खडे ऌतने लोगों को देखकर ऐसी घबराई कि कुछ कहते न बना। झट से पल्ला सिर पर रखती हुई खडी हो गयीं और जमीन को देखने लगीं। उनके पांव लडख़डाने लगे और हाथों की उंगलियां थर-थर कांपने लगीं।
मां, तुम जाके सो जाओ, तुम क्यों इतनी देर तक जाग रही थीं? - और खिसियायी हुई नजरों से शामनाथ चीफ के मुंह की ओर देखने लगे।
चीफ के चेहरे पर मुस्कराहट थी। वह वहीं खडे-ख़डे बोले, नमस्ते!
मां ने झिझकते हुए, अपने में सिमटते हुए दोनों हाथ जोडे, मगर एक हाथ दुपट्टे के अन्दर माला को पकडे हुए था, दूसरा बाहर, ठीक तरह से नमस्ते भी न कर पाई। शामनाथ इस पर भी खिन्न हो उठे।
इतने में चीफ ने अपना दायां हाथ, हाथ मिलाने के लिए मां के आगे किया। मां और भी घबरा उठीं।
मां, हाथ मिलाओ।
पर हाथ कैसे मिलातीं? दायें हाथ में तो माला थी। घबराहट में मां ने बायां हाथ ही साहब के दायें हाथ में रख दिया। शामनाथ दिल ही दिल में जल उठे। देसी अफसरों की स्त्रियां खिलखिलाकर हंस पडीं।
यूं नहीं, मां! तुम तो जानती हो, दायां हाथ मिलाया जाता है। दायां हाथ मिलाओ।
मगर तब तक चीफ मां का बायां हाथ ही बार-बार हिलाकर कह रहे थे - हाउ डू यू डू?
कहों मां, मैं ठीक हूं, खैरियत से हूं।
मां कुछ बडबडाई।
मां कहती हैं, मैं ठीक हूं। कहो मां, हाउ डू यू डू।
मां धीरे से सकुचाते हुए बोलीं - हौ डू डू ..
एक बार फिर कहकहा उठा।
वातावरण हल्का होने लगा। साहब ने स्थिति संभाल ली थी। लोग हंसने-चहकने लगे थे। शामनाथ के मन का क्षोभ भी कुछ-कुछ कम होने लगा था।
साहब अपने हाथ में मां का हाथ अब भी पकडे हुए थे, और मां सिकुडी ज़ा रही थीं। साहब के मुंह से शराब की बू आ रही थी।
शामनाथ अंग्रेजी में बोले - मेरी मां गांव की रहने वाली हैं। उमर भर गांव में रही हैं। इसलिए आपसे लजाती है।
साहब इस पर खुश नजर आए। बोले - सच? मुझे गांव के लोग बहुत पसन्द हैं, तब तो तुम्हारी मां गांव के गीत और नाच भी जानती होंगी? चीफ खुशी से सिर हिलाते हुए मां को टिकटिकी बांधे देखने लगे।
मां, साहब कहते हैं, कोई गाना सुनाओ। कोई पुराना गीत तुम्हें तो कितने ही याद होंगे।
मां धीरे से बोली - मैं क्या गाऊंगी बेटा। मैंने कब गाया है?
वाह, मां! मेहमान का कहा भी कोई टालता है?
साहब ने इतना रीझ से कहा है, नहीं गाओगी, तो साहब बुरा मानेंगे।
मैं क्या गाऊं, बेटा। मुझे क्या आता है?
वाह! कोई बढिया टप्पे सुना दो। दो पत्तर अनारां दे ..
देसी अफसर और उनकी स्त्रियों ने इस सुझाव पर तालियां पीटी। मां कभी दीन दृष्टि से बेटे के चेहरे को देखतीं, कभी पास खडी बहू के चेहरे को।
इतने में बेटे ने गंभीर आदेश-भरे लिहाज में कहा - मां!
इसके बाद हां या ना सवाल ही न उठता था। मां बैठ गयीं और क्षीण, दुर्बल, लरजती आवाज में एक पुराना विवाह का गीत गाने लगीं -
हरिया नी माये, हरिया नी भैणे
हरिया ते भागी भरिया है!
देसी स्त्रियां खिलखिला के हंस उठीं। तीन पंक्तियां गा के मां चुप हो गयीं।
बरामदा तालियों से गूंज उठा। साहब तालियां पीटना बन्द ही न करते थे। शामनाथ की खीज प्रसन्नता और गर्व में बदल उठी थी। मां ने पार्टी में नया रंग भर दिया था।
तालियां थमने पर साहब बोले - पंजाब के गांवों की दस्तकारी क्या है?
शामनाथ खुशी में झूम रहे थे। बोले - ओ, बहुत कुछ - साहब! मैं आपको एक सेट उन चीजों का भेंट करूंगा। आप उन्हें देखकर खुश होंगे।
मगर साहब ने सिर हिलाकर अंग्रेजी में फिर पूछा - नहीं, मैं दुकानों की चीज नहीं मांगता। पंजाबियों के घरों में क्या बनता है, औरतें खुद क्या बनाती हैं?
शामनाथ कुछ सोचते हुए बोले - लडक़ियां गुडियां बनाती हैं, और फुलकारियां बनाती हैं।
फुलकारी क्या?
शामनाथ फुलकारी का मतलब समझाने की असफल चेष्टा करने के बाद मां को बोले - क्यों, मां, कोई पुरानी फुलकारी घर में हैं?
मां चुपचाप अन्दर गयीं और अपनी पुरानी फुलकारी उठा लायीं।
साहब बडी रूचि से फुलकारी देखने लगे। पुरानी फुलकारी थी, जगह-जगह से उसके तागे टूट रहे थे और कपडा फटने लगा था। साहब की रूचि को देखकर शामनाथ बोले - यह फटी हुई है, साहब, मैं आपको नई बनवा दूंगा। मां बना देंगी। क्यों, मां साहब को फुलकारी बहुत पसन्द हैं, इन्हें ऐसी ही एक फुलकारी बना दोगी न?
मां चुप रहीं। फिर डरते-डरते धीरे से बोलीं - अब मेरी नजर कहां है, बेटा! बूढी आंखें क्या देखेंगी?
मगर मां का वाक्य बीच में ही तोडते हुए शामनाथ साहब को बोले - वह जरूर बना देंगी। आप उसे देखकर खुश होंगे।
साहब ने सिर हिलाया, धन्यवाद किया और हल्के-हल्के झूमते हुए खाने की मेज क़ी ओर बढ ग़ये। बाकी मेहमान भी उनके पीछे-पीछे हो लिये।
जब मेहमान बैठ गये और मां पर से सबकी आंखें हट गयीं, तो मां धीरे से कुर्सी पर से उठीं, और सबसे नजरें बचाती हुई अपनी कोठरी में चली गयीं।
मगर कोठरी में बैठने की देर थी कि आंखों में छल-छल आंसू बहने लगे। वह दुपट्टे से बार-बार उन्हें पोंछतीं, पर वह बार-बार उमड आते, जैसे बरसों का बांध तोडक़र उमड आये हों। मां ने बहुतेरा दिल को समझाया, हाथ जोडे, भगवान का नाम लिया, बेटे के चिरायु होने की प्रार्थना की, बार-बार आंखें बन्द कीं, मगर आंसू बरसात के पानी की तरह जैसे थमने में ही न आते थे।
आधी रात का वक्त होगा। मेहमान खाना खाकर एक-एक करके जा चुके थे। मां दीवार से सटकर बैठी आंखें फाडे दीवार को देखे जा रही थीं। घर के वातावरण में तनाव ढीला पड चुका था। मुहल्ले की निस्तब्धता शामनाथ के घर भी छा चुकी थी, केवल रसोई में प्लेटों के खनकने की आवाज आ रही थी। तभी सहसा मां की कोठरी का दरवाजा जोर से खटकने लगा।
मां, दरवाजा खोलो।
मां का दिल बैठ गया। हडबडाकर उठ बैठीं। क्या मुझसे फिर कोई भूल हो गयी? मां कितनी देर से अपने आपको कोस रही थीं कि क्यों उन्हें नींद आ गयी, क्यों वह ऊंघने लगीं। क्या बेटे ने अभी तक क्षमा नहीं किया? मां उठीं और कांपते हाथों से दरवाजा खोल दिया।
दरवाजे खुलते ही शामनाथ झूमते हुए आगे बढ आये और मां को आलिंगन में भर लिया।
ओ अम्मी! तुमने तो आज रंग ला दिया! ..साहब तुमसे इतना खुश हुआ कि क्या कहूं। ओ अम्मी! अम्मी!
मां की छोटी-सी काया सिमटकर बेटे के आलिंगन में छिप गयी। मां की आंखों में फिर आंसू आ गये। उन्हें पोंछती हुई धीरे से बोली - बेटा, तुम मुझे हरिद्वार भेज दो। मैं कब से कह रही हूं।
शामनाथ का झूमना सहसा बन्द हो गया और उनकी पेशानी पर फिर तनाव के बल पडने लगे। उनकी बाहें मां के शरीर पर से हट आयीं।
क्या कहा, मां? यह कौन-सा राग तुमने फिर छेड दिया?
शामनाथ का क्रोध बढने लगा था, बोलते गये - तुम मुझे बदनाम करना चाहती हो, ताकि दुनिया कहे कि बेटा मां को अपने पास नहीं रख सकता।
नहीं बेटा, अब तुम अपनी बहू के साथ जैसा मन चाहे रहो। मैंने अपना खा-पहन लिया। अब यहां क्या करूंगी। जो थोडे दिन जिन्दगानी के बाकी हैं, भगवान का नाम लूंगी। तुम मुझे हरिद्वार भेज दो!
तुम चली जाओगी, तो फुलकारी कौन बनायेगा? साहब से तुम्हारे सामने ही फुलकारी देने का इकरार किया है।
मेरी आंखें अब नहीं हैं, बेटा, जो फुलकारी बना सकूं। तुम कहीं और से बनवा लो। बनी-बनायी ले लो।
मां, तुम मुझे धोखा देके यूं चली जाओगी? मेरा बनता काम बिगाड़ोगी? जानती नही, साहब खुश होगा, तो मुझे तरक्की मिलेगी!
मां चुप हो गयीं। फिर बेटे के मुंह की ओर देखती हुई बोली - क्या तेरी तरक्की होगी? क्या साहब तेरी तरक्की कर देगा? क्या उसने कुछ कहा है?
कहा नहीं, मगर देखती नहीं, कितना खुश गया है। कहता था, जब तेरी मां फुलकारी बनाना शुरू करेंगी, तो मैं देखने आऊंगा कि कैसे बनाती हैं। जो साहब खुश हो गया, तो मुझे इससे बडी नौकरी भी मिल सकती है, मैं बडा अफसर बन सकता हूं।
मां के चेहरे का रंग बदलने लगा, धीरे-धीरे उनका झुर्रियों-भरा मुंह खिलने लगा, आंखों में हल्की-हल्की चमक आने लगी।
तो तेरी तरक्की होगी बेटा?
तरक्की यूं ही हो जायेगी? साहब को खुश रखूंगा, तो कुछ करेगा, वरना उसकी खिदमत करने वाले और थोडे हैं?
तो मैं बना दूंगी, बेटा, जैसे बन पडेग़ा, बना दूंगी।
और मां दिल ही दिल में फिर बेटे के उज्ज्वल भविष्य की कामनायें करने लगीं और मिस्टर शामनाथ, अब सो जाओ, मां, कहते हुए, तनिक लडख़डाते हुए अपने कमरे की ओर घूम गये।

Wednesday, April 08, 2026

नीड़......... (पुष्पा भाटिया)

 सिद्धेश्वरीजी बड़बड़ाए जा रही थीं. जितनी तेजी से वे माथे पर हाथ फेर रही थीं उतनी ही तेजी से जबान भी चला रही थीं.


‘नहीं, अब एक क्षण भी इस घर में नहीं रहूंगी. इस घर का पानी तक नहीं पियूंगी. हद होती है किसी बात की. दो टके के माली की भी इतनी हिम्मत कि हम से मुंहजोरी करे. समझ क्या रखा है. अब हम लौट कर इस देहरी पर कभी आएंगे भी नहीं.’

रमानंदजी वहीं आरामकुरसी पर बैठे उन का बड़बड़ाना सुन रहे थे. आखिरकार वे बोले, ‘‘एक तो समस्या जैसी कोई बात नहीं, उस पर तुम्हारा यह बरताव, कैसे काम चलेगा? बोलो? कुल इतनी सी ही बात है न, कि हरिया माली ने तुम्हें गुलाब का फूल तोड़ने नहीं दिया. गेंदे या मोतिया का फूल तोड़ लेतीं. ये छोटीछोटी बातें हैं. तुम्हें इन सब के साथ समझौता करना चाहिए.’’

सिद्धेश्वरीजी पति को एकटक निहार रही थीं. मन उलझा हुआ था. जो बातें उन के लिए बहुत बड़ी होती हैं, रमानंदजी के पास जा कर छोटी क्यों हो जाती हैं?

क्रोध से उबलते हुए बोलीं, ‘‘एक गुलाब से क्या जाता. याद है, लखनऊ में कितना बड़ा बगीचा था हम लोगों का. सुबह सैर से लौट कर हरसिंगार और चमेली के फूल चुन कर हम डोलची में सजा कर रख लिया करते थे. पर यह माली, इस तरह अकड़ रहा था जैसे हम ने कभी फूल ही नहीं देखे हों.’’

बेचारा हरिया माली कोने में खड़ा गिड़गिड़ा रहा था. घर के दूसरे लोग भी डरेसहमे खड़े थे. अपनी तरफ से सभी ने मनाने की कोशिश की किंतु व्यर्थ. सिद्धेश्वरीजी टस से मस नहीं हुईं.

‘‘जो कह दिया सो कह दिया. मेरी बात पत्थर की लकीर है. अब इसे कोई भी नहीं मिटा सकता. समझ गए न? यह सिद्धेश्वरी टूट जाएगी पर झुकेगी नहीं.’’

घर वाले उन की धमकियों के आदी थे. उन की बातचीत का तरीका ही ऐसा है, बातबात पर कसम खा लेना, बिना बात के ही ताल ठोंकना आदि. पहले ये बातें उन के अपने घर में होती थीं. अपना घर, यानी सरकार द्वारा आवंटित बंगला. सिद्धेश्वरीजी गरजतीं, बरसतीं फिर सामान्य हो जातीं. घर छोड़ कर जाने की नौबत कभी नहीं आई. हर बात में दखल रखना वे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती थीं. सो, वे दूसरों को घर से निकल जाने को अकसर कहतीं. पर स्वयं पर यह बात कभी लागू नहीं होने देती थीं. आखिर वे घर की मालकिन जो थीं.

आज परिस्थिति दूसरी थी. यह घर, उन के बेटे समीर का था. बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत सीनियर एग्जीक्यूटिव. राजधानी में अत्यधिक, सुरुचिपूर्ण ढंग से सजा हुआ टैरेस वाला फ्लैट. बेटे के अत्यधिक आज्ञाकारी होने के बावजूद वे उस के घर को कभी अपना नहीं समझ पाईं क्योंकि वे उन महिलाओं में से थीं जो बेटे का विवाह होने के साथ ही उसे पराया समझने लगती हैं. अपनी हमउम्र औरतों के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए वे जब भी समीर और शालिनी से बात करतीं तो ताने या उलटवांसी के रूप में. बातबात में दोहों और मुहावरों का प्रयोग, भले ही मूलरूप के बजाय अपभ्रंश के रूप में, सिद्धेश्वरीजी करती अवश्य थीं, क्योंकि उन का मानना था कि अतिशय लाड़प्यार जतलाने से बहूबेटे का दिमाग सातवें आसमान पर पहुंच जाता है.

विवाह से पहले समीर उन की आंखों का तारा था. उस से उन का पहला मनमुटाव तब हुआ जब उस ने विजातीय शालिनी से विवाह करने की अनुमति मांगी थी. रमानंदजी सरल स्वभाव के व्यक्ति थे. दूसरों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढ़ते थे. बेटे की खुशी को ध्यान में रख कर उन्होंने तुरंत हामी भर दी थी. पत्नी को भी समझाया था, ‘शालिनी सुंदर है, सुशिक्षित है, अच्छे खानदान से है.’ पर सिद्धेश्वरीजी अड़ी रहीं. इस के पीछे उन्हें अपने भोलेभाले बेटे का दिमाग कम, एमबीए शालिनी की सोच अधिक नजर आई थी. बेटे के सीनियर एग्जीक्यूटिव होने के बावजूद उन्हें उस के लिए डाक्टर या इंजीनियर लड़की के बजाय मात्र इंटर पास साधारण सी कन्या की तलाश थी, जो हर वक्त उन की सेवा में तत्पर रहे और घर की परंपरा को भी आगे कायम रखे.

रमानंदजी लाख समझाते रहे कि ब्याह समीर को करना है. अगर उस ने अपनी पसंद से शालिनी को चुना है तो हम क्यों बुरा मानें. दोनों एकदूसरे को अच्छी तरह से जानते हैं, पहचानते हैं और सब से बड़ी बात एकदूसरे को समझते भी हैं. सो, वे अच्छी तरह से निभा लेंगे. पर सिद्धेश्वरीजी के मन में बेटे का अपनी मनमरजी से विवाह करने का कांटा हमेशा चुभता रहा. उन्हें ऐसा लगता जैसे शालिनी के साथ विवाह कर के समीर ने बहुत बड़ा गुनाह किया है. खैर, किसी तरह से निभ रही थी और अच्छी ही निभ रही थी. रमानंदजी सिंचाई विभाग में अधिशासी अभियंता थे. हर 3 साल में उन का तबादला होता रहता था. इसी बहाने वे भी उत्तर प्रदेश के कई छोटेबड़े शहर घूमी थीं. बड़ेबड़े बंगलों का सुख भी खूब लूटा. नौकर, चपरासी सलाम ठोंकते. समीर और शालिनी दिल्ली में रहते थे. कभीकभार ही आनाजाना हो पाता. जितने दिन रहते, हंसतेखिलखिलाते समय निकल जाता था. स्वाति और अनिरुद्ध के जन्म के बाद तो जीवन में नए रंग भरने लगे थे. उन की धमाचौकडि़यों और खिलखिलाहटों में दिनरात कैसे बीत जाते, पता ही नहीं चलता था.

देखते ही देखते रमानंदजी की रिटायरमैंट की उम्र भी आ पहुंची. लखनऊ में रिटायरमैंट से पहले उन्होंने अनूपशहर चल कर रहने का प्रस्ताव सिद्धेश्वरीजी के सामने रखा तो वे नाराज हो गईं.

‘हम नहीं रहेंगे वहां की घिचपिच में.’

‘तो फिर?’

‘इसीलिए हम हमेशा आप से कहते थे. एक छोटा सा मकान, बुढ़ापे के लिए बनवा लीजिए पर आप ने हमेशा मेरी बात को हवा में उछाल दिया.’

रमानंदजी मायूस हो गए थे. ‘सिद्धेश्वरी, तुम तो जानती हो, सरकारी नौकरी में कितना पैसा हाथ में मिलता है. घूस मैं ने कभी ली नहीं. मुट्ठीभर तनख्वाह में से क्या खाता, क्या बचाता? बाबूजी की बचपन में ही मृत्यु हो गई. भाईबहनों के दायित्व निभाए. तब तक समीर और नेहा बड़े हो गए थे. एक ही समय में दोनों बच्चों को इंजीनियरिंग और एमबीए की डिगरी दिलवाना, आसान तो नहीं था. उस के बाद जो बचा, वह शादियों में खर्च हो गया. यह अच्छी बात है कि दोनों बच्चे सुखी हैं.’

रमानंदजी भावुक हो उठे थे. आंखों की कोर भीग गई. स्वर आर्द्र हो उठा था, रिटायरमैंट के बाद रहने की समस्या जस की तस बनी रही. इस समस्या का निवारण कैसे होता?

फिलहाल, दौड़भाग कर रमानंदजी ने सरकारी बंगले में ही 6 महीने रहने की अनुमति हासिल कर ली. कुछ दिनों के लिए तो समस्या सुलझ गई थी लेकिन उस के बाद मार्केट रेंट पर बंगले में रहना, उन के लिए मुश्किल हो गया था. सो, लखनऊ के गोमती नगर में 2 कमरों का मकान उन्होंने किराए पर ले लिया था. जब भी मौका मिलता, समीर आ कर मिल जाता. शालिनी नहीं आ पाती थी. बच्चे बड़े हो रहे थे. स्वाति ने इंटर पास कर के डाक्टरी में दाखिला ले लिया था. अनिरुद्ध ने 10वीं में प्रवेश लिया था. बच्चों के बड़े होने के साथसाथ दादादादी की भी उम्र हो गई थी.

बुढ़ापे में कई तरह की परेशानियां बढ़ जाती हैं, यह सोच कर इस बार जब समीर और शालिनी लखनऊ आए तो, आग्रहसहित उन्हें अपने साथ रहने के लिए लिवा ले गए थे. सिद्धेश्वरीजी ने इस बार भी नानुकुर तो बहुतेरी की थी, पर समीर जिद पर अड़ गया था. ‘‘बुढ़ापे में आप दोनों का अकेले रहना ठीक नहीं है. और बारबार हमारा आना भी उतनी दूर से संभव नहीं है. बच्चों की पढ़ाई का नुकसान अलग से होता है.’’ सिद्धेश्वरीजी को मन मार कर हामी भरनी पड़ी. अपनी गृहस्थी तीनपांच कर यहां आ तो गई थीं पर बेटेबहू की गृहस्थी में तारतम्य बैठाना थोड़ा मुश्किल हो रहा था उन के लिए. बेटाबहू उन की सुविधा का पूरा ध्यान रखते थे. उन्हें शिकायत का मौका नहीं देते थे. फिर भी, जब मौका मिलता, सिद्धेश्वरीजी रमानंदजी को उलाहना देने से बाज नहीं आती थीं, ‘अपना मकान होता तो बहूबेटे के साथ रहने की समस्या तो नहीं आती. अपनी सुविधा से घर बनवाते और रहते. यहां पड़े हैं दूसरों की गृहस्थी में.’

‘दूसरों की गृहस्थी में नहीं, अपने बहूबेटे के साथ रह रहे हैं सिद्धेश्वरी,’ वे हंस कर कहते.

‘तुम नहीं समझोगे,’ सिद्धेश्वरीजी टेढ़ा सा मुंह बिचका कर उठ खड़ी होतीं.

उन्हें बातबात में हस्तक्षेप करने की आदत थी. मसलन, स्वाति कोएड में क्यों पढ़ती है? स्कूटर चला कर कालेज अकेली क्यों जाती है? शाम ढलते ही घर क्यों नहीं लौट आती? देर रात तक लड़केलड़कियों के साथ बैठ कर कंप्यूटर पर काम क्यों करती है? लड़कियों के साथ तो फिर भी ठीक है, लड़कों के साथ क्यों बैठी रहती है? उन्होंने कहीं सुना था कि कंप्यूटर अच्छी चीज नहीं है. वे अनिरुद्ध को उन के बीच जा कर बैठने के लिए कहतीं कि कम से कम पता तो चले वहां हो क्या रहा है. तो अनिरुद्ध बिदक जाता. उधर, स्वाति को भी बुरा लगता. ऐसा लगता जैसे दादी उस के ऊपर पहरा बिठा रही हों. इतना ही नहीं, वह जींसटौप क्यों पहनती है? साड़ी क्यों नहीं पहनती? रसोई में काम क्यों नहीं करती आदि?

धीरेधीरे स्वाति ने उन से बात करना कम कर दिया. वह उन से दूर ही छिटकी रहती. वे कुछ कहतीं तो उन की बातें एक कान से सुनती, दूसरे कान से निकाल देती. पोती के बाद उन का विरोध अपनी बहू से भी था. उसे सीधेसीधे टोकने के बजाय रमानंदजी से कहतीं, ‘बहुत सिर चढ़ा रखा है बहू ने स्वाति को. मुझे तो डर है, कहीं उस की वजह से इन दोनों की नाक न कट जाए.’ रमानंदजी चुपचाप पीतल के शोपीस चमकाते रहते. सिद्धेश्वरीजी का भाषण निरंतर जारी रहता, ‘बहू खुद भी तो सारा दिन घर से बाहर रहती है. तभी तो, न घर संभल पा रहा है न बच्चे. कहीं नौकरों के भरोसे भी गृहस्थी चलती है?’

‘बहू की नौकरी ही ऐसी है. दिन में 2 घंटे उसे घर से बाहर निकलना ही पड़ता है. अब काम चाहे 2 घंटे का हो या 4 घंटे का, आवाजाही में भी समय निकलता है.’

‘जरूरत क्या है नौकरी करने की? समीर अच्छा कमाता ही है.’

‘अब इस उम्र में बहू मनकों की माला तो फेरने से रही. पढ़ीलिखी है. अपनी प्रतिभा सिद्ध करने का अवसर मिलता है तो क्यों न करे. अच्छा पैसा कमाती है तो समीर को भी सहारा मिलता है. यह तो हमारे लिए गौरव की बात है.’ इधर, रमानंदजी ने अपनेआप को सब के अनुसार ढाल लिया था. मजे से पोतापोती के साथ बैठ कर कार्टून फिल्में देखते, उन के लिए पिज्जा तैयार कर देते. बच्चों के साथ बैठ कर पौप म्यूजिक सुनते. पासपड़ोस के लोगों से भी उन की अच्छी दोस्ती हो गई थी. जब भी मन करता, उन के साथ ताश या शतरंज की बाजी खेल लेते थे.

बहू के साथ भी उन की खूब पटती थी. रमानंदजी के आने से वह पूरी तरह निश्चिंत हो गई थी. अनिरुद्ध को नियमित रूप से भौतिकी और रसायनशास्त्र रमानंदजी ही पढ़ाते थे. उस की प्रोजैक्ट रिपोर्ट भी उन्होंने ही तैयार करवाई थी. बच्चों को छोड़ कर शालिनी पति के साथ एकाध दिन दौरे पर भी चली जाती थी. रमानंदजी को तो कोई असुविधा नहीं होती थी पर सिद्धेश्वरीजी जलभुन जाती थीं. झल्ला कर कहतीं, ‘बहू को आप ने बहुत छूट दे रखी है.’

रमानंदजी चुप रहते, तो वे और चिढ़ जातीं, ‘अपने दिन याद हैं? अम्मा जब गांव से आती थीं तो हम दोनों का घूमनाफिरना तो दूर, साड़ी का पल्ला भी जरा सा सिर से सरकता तो वे रूठ जाती थीं.’

‘अपने दिन नहीं भूला हूं, तभी तो बेटेबहू का मन समझता हूं.’

‘क्या समझते हो?’

‘यही कि अभी इन के घूमनेफिरने के दिन हैं. घूम लें. और फिर बहू हमारे लिए पूरी व्यवस्था कर के जाती है. फिर क्या परेशानी है?’

‘परेशानी तुम्हें नहीं, मुझे है. बुढ़ापे में घर संभालना पड़ता है.’

‘जरा सोचो, बहू तुम्हारे पर विश्वास करती है, इसीलिए तो तुम्हारे भरोसे घर छोड़ कर जाती है.’

सिद्धेश्वरीजी को कोई जवाब नहीं सूझता था. उन्हें लगता, पति समेत सभी उन के खिलाफ हैं.

दरअसल, वे दिल की इतनी बुरी नहीं हैं. बस, अपने वर्चस्व को हमेशा बरकरार रखने की, अपना महत्त्व जतलाने की आदत से मजबूर थीं. उन की मरजी के बिना घर का पत्ता तक नहीं हिलता था. यहां तक कि रमानंदजी ने भी कभी उन से तर्क नहीं किया था. बेटे के यहां आ कर उन्होंने देखा, सभी अपनीअपनी दुनिया में मगन हैं, तो उन्हें थोड़ी सी कोफ्त हुई. उन्हें ऐसा महसूस होने लगा जैसे वे अब एक अस्तित्वविहीन सा जीवन जी रही हों. पिछले हफ्ते से एक और बात ने उन्हें परेशान कर रखा था. स्वाति को आजकल मार्शल आर्ट सीखने की धुन सवार हो गई थी. उन्होंने रोकने की कोशिश की तो वह उग्र स्वर में बोली, ‘बड़ी मां, आज के जमाने में अपनी सुरक्षा के लिए ये सब जरूरी है. सभी सीख रहे हैं.’

पोती की ढिठाई देख कर सिद्धेश्वरीजी सातवें आसमान से सीधी धरातल पर आ गिरीं. उस से भी अधिक गुस्सा आया अपने बहूबेटे पर, जो मूकदर्शक बने सारा तमाशा देख रहे थे. बेटी को एक बार टोका तक नहीं. और अब, इस हरिया माली की, गुलाब का फूल न तोड़ने की हिदायत ने आग में घी डालने जैसा काम किया था. एक बात का गुस्सा हमेशा दूसरी बात पर ही उतरता है, इसीलिए उन्होंने घर छोड़ कर जाने की घोषणा कर दी थी.

‘‘मां, हम बाहर जा रहे हैं. कुछ मंगाना तो नहीं है?’’
सिद्धेश्वरीजी मुंह फुला कर बोलीं, ‘‘इन्हें क्या मंगाना होगा? इन के लिए पान का जुगाड़ तो माली, नौकर यहां तक कि ड्राइवर भी कर देते हैं. हमें ही साबुन, क्रीम और तेल मंगाना था. पर कहें किस से? समीर भी आजकल दौरे पर रहता है. पिछले महीने जब आया था तो सब ले कर दे गया था. जिस ब्रैंड की क्रीम, पाउडर हम इस्तेमाल करते हैं वही ला देता है.’’

‘‘मां, हम आप की पसंदनापसंद का पूरा ध्यान रखते हैं. फिर भी कुछ खास चाहिए तो बता क्यों नहीं देतीं? समीर से कहने की क्या जरूरत है?’’

बहू की आवाज में नाराजगी का पुट था. पैर पटकती वह घर से बाहर निकली, तो रमानंदजी का सारा आक्रोश, सारी झल्लाहट पत्नी पर उतरी, ‘‘सुन लिया जवाब. मिल गई संतुष्टि. कितनी बार कहा है, जहां रहो वहीं की बन कर रहो.  पिछली बार जब नेहा के पास मुंबई गई थीं तब भी कम तमाशे नहीं किए थे तुम ने. बेचारी नेहा, तुम्हारे और जमाई बाबू के बीच घुन की तरह पिस कर रह गई थी. हमेशा कोई न कोई ऐसा कांड जरूर करती हो कि वातावरण में सड़ी मच्छी सी गंध आने लगती है.’’ पछता तो सिद्धेश्वरीजी खुद भी रही थीं, सोच रही थीं, बहू के साथ बाजार जा कर कुछ खरीद लाएंगी. अगले हफ्ते मेरठ में उन के भतीजे का ब्याह है. कुछ ब्लाउज सिलवाने थे. जातीं तो बिंदी, चूडि़यां और पर्स भी ले आतीं. बहू बाजार घुमाने की शौकीन है. हमेशा उन्हें साथ ले जाती है. वापसी में गंगू चाट वाले के गोलगप्पे और चाटपापड़ी भी जरूर खिलाती है.

रमानंदजी को तो ऐसा कोई शौक है नहीं. लेकिन अब तो सब उलटापुलटा हो गया. क्यों उन्होंने बहू का मूड उखाड़ दिया? न जाने किस घड़ी में उन की बुद्धि भ्रष्ट हो गई और घर छोड़ने की बात कह दी? सब से बड़ी बात, इस घर से निकल कर जाएंगी कहां? लखनऊ तो कब का छोड़ चुकीं. आज तक गांव में एक हफ्ते से ज्यादा कभी नहीं रहीं. फिर, पूरा जीवन कैसे काटेंगी? वह भी इस बुढ़ापे में, जब शरीर भी साथ नहीं देता है. शुरू से ही नौकरों से काम करवाने की आदी रही हैं. बेटेबहू के घर आ कर तो और भी हड्डियों में जंग लग गया है.

सभी चुपचाप थे. शालिनी रसोई में बाई के साथ मिल कर रात के खाने की तैयारी कर रही थी. और स्वाति, जिस की वजह से यह सारा झमेला हुआ, मजे से लैपटौप पर काम कर रही थी. सिद्धेश्वरीजी पति की तरफ मुखातिब हुईं और अपने गुस्से को जज्ब करते हुए बोलीं, ‘‘चलो, तुम भी सामान बांध लो.’’

‘‘किसलिए?’’ रमानंदजी सहज भाव से बोले. उन की नजरें अखबार की सुर्खियों पर अटकी थीं.

‘‘हम, आज शाम की गाड़ी से ही चले जाएंगे.’’

रमानंदजी ने पेपर मोड़ कर एक तरफ रखा और बोले, ‘‘तुम जा रही हो, मैं थोड़े ही जा रहा हूं.’’

‘‘मतलब, तुम नहीं जाओगे?’’

‘‘नहीं,’’ एकदम साफ और दोटूक स्वर में रमानंदजी ने कहा, तो सिद्धेश्वरीजी बुरी तरह चौंक गईं. उन्हें पति से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी. मन ही मन उन का आत्मबल गिरने लगा. गांव जा कर, बंद घर को खोलना, साफसफाई करना, चूल्हा सुलगाना, राशन भरना उन्हें चांद पर जाने और एवरेस्ट पर चढ़ने से अधिक कठिन और जोखिम भरा लग रहा था. पर क्या करतीं, बात तो मुंह से फिसल ही गई थी. पति के हृदयपरिवर्तन का उन्हें जरा भी आभास होता तो यों क्षणिक आवेश में घर छोड़ने का निर्णय कभी न लेतीं. हिम्मत कर के वे उठीं और अलमारी में से अपने कपड़े निकाल कर बैग में रख लिए. ड्राइवर को गाड़ी लाने का हुक्म दे दिया. कार स्टार्ट होने ही वाली थी कि स्वाति बाहर निकल आई. ड्राइवर से उतरने को कह कर वह स्वयं ड्राइविंग सीट पर बैठ गई और सधे हाथों से स्टीयरिंग थाम कर कार स्टार्ट कर दी. सिद्धेश्वरीजी एक बार फिर जलभुन गईं. औरतों का ड्राइविंग करना उन्हें कदापि पसंद नहीं था. बेटा या पोता, कार ड्राइव करे तो उन्हें कोई परेशानी नहीं होती थी. वे यह मान कर चलती थीं कि ‘लड़कियों को लड़कियों की तरह ही रहना चाहिए. यही उन्हें शोभा देता है.’

इसी उधेड़बुन में रास्ता कट गया. कार स्टेशन पर आ कर रुकी तो सिद्धेश्वरीजी उतर गईं. तुरतफुरत अपना बैग उठाया और सड़क पार करने लगीं. उतावलेपन में पोती को साथ लेने का धैर्य भी उन में नहीं रहा. तभी अचानक एक कार...पीछे से किसी ने उन का हाथ पकड़ कर खींच लिया. और वे एकदम से दूर जा गिरीं. फिर उन्हीं हाथों ने सिद्धेश्वरीजी को सहारा दे कर कार में बिठाया. ऐसा लगा जैसे मृत्यु उन से ठीक सूत भर के फासले से छू कर निकल गई हो. यह सब कुछ दो पल में ही हो गया था. उन का हाथ थाम कर खड़ा करने और कार में बिठाने वाले हाथ स्वाति के थे. नीम बेहोशी की हालत से उबरीं तो देखा, वे अस्पताल के बिस्तर पर थीं. रमानंदजी उन के सिरहाने बैठे थे. समीर और शालिनी डाक्टरों से विचारविमर्श कर रहे थे. और स्वाति, दारोगा को रिपोर्ट लिखवा रही थी. साथ ही वह इनोवा कार वाले लड़के को बुरी तरह दुत्कारती भी जा रही थी. ‘‘दारोगा साहब, इस सिरफिरे बिगड़ैल लड़के को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाइएगा. कुछ दिन हवालात में रहेगा तो एहसास होगा कि कार सड़क पर चलाने के लिए होती है, किसी की जान लेने के लिए नहीं. अगर मेरी बड़ी मां को कुछ हो जाता तो...?’’

सिद्धेश्वरीजी के पैरों में मोच आई थी. प्राथमिक चिकित्सा के बाद उन्हें घर जाने की अनुमति मिल गई थी. उन के घर पहुंचने से पहले ही बहू और बेटे ने, उन की सुविधानुसार कमरे की व्यवस्था कर दी थी. समीर और शालिनी ने अपना बैडरूम उन्हें दे दिया था क्योंकि बाथरूम बैडरूम से जुड़ा था. वे दोनों किनारे वाले बैडरूम में शिफ्ट हो गए थे. सिरहाने रखे स्टूल पर बिस्कुट का डब्बा, इलैक्ट्रिक कैटल, मिल्क पाउडर और टी बैग्स रख दिए गए. चाय की शौकीन सिद्धेश्वरीजी जब चाहे चाय बना सकती थीं. उन्हें ज्यादा हिलनेडुलने की भी जरूरत नहीं थी. पलंग के नीचे समीर ने बैडस्विच लगवा दिया था. वे जैसे ही स्विच दबातीं, कोई न कोई उन की सेवा में उपस्थित हो जाता.

अगले दिन तक नेहा और जमाई बाबू भी पहुंच गए. घर में खुशी की लहर दौड़ गई थी. उन के आने से समीर और शालिनी को भी काफी राहत मिल गई थी. कुछ समय के लिए दोनों दफ्तर हो आते. नेहा मां के पास बैठती तो स्वाति अस्पताल हो आती थी. इन दिनों उस की इन्टर्नशिप चल रही थी. अस्पताल जाना उस के लिए निहायत जरूरी था. शाम को सभी उन के कमरे में एकत्रित होते. कभी ताश, कभी किस्सेकहानियों के दौर चलते तो घंटों का समय मिनटों में बदल जाता. वे मंदमंद मुसकराती अपनी हरीभरी बगिया का आनंद उठाती रहतीं. सिद्धेश्वरीजी एक दिन चाय पी कर लेटीं तो उन का ध्यान सामने खिड़की पर बैठे कबूतर की तरफ चला गया. खिड़की के जाली के किवाड़ बंद थे, जबकि शीशे के खुले थे. मुश्किल से 5 इंच की जगह रही होगी जिस पर वह पक्षी बड़े आराम से बैठा था. तभी नेहा और शालिनी कमरे में आ गईं, बोलीं, ‘‘मां, इस कबूतर को यहां से उड़ाना होगा. यहां बैठा रहा तो गंदगी फैलाएगा.’’

‘‘न, न. इसे उड़ाने की कोशिश भी मत करना. अब तो चैत का महीना आने वाला है. पक्षी जगह ढूंढ़ कर घोंसला बनाते हैं.’’

उन की बात सच निकली. देखा, एक दूसरा कबूतर न जाने कहां से तिनके, घास वगैरह ला कर इकट्ठे करने लगा. वह नर व मादा का जोड़ा था. मादा गर्भवती थी. नर ही उस के लिए दाना लाता था और चोंच से उसे खिलाता था. सिद्धेश्वरीजी मंत्रमुग्ध हो कर उन्हें देखतीं. पक्षियों को नीड़ बनाते देख उन्हें अपनी गृहस्थी जोड़ना याद आ जाता. उन्होंने भी अपनी गृहस्थी इसी तरह बनाई थी. रमानंदजी कमा कर लाते, वे बड़ी ही समझदारी से उन पैसों को खर्चतीं. 2 देवर, 2 ननदें ब्याहीं. मायके से जो भी मिला, वह ननदों के ब्याह में चढ़ गया. लोहे के 2 बड़े संदूकों को ले कर अपने नीड़ का निर्माण किया. बच्चे पढ़ाए. उन के ब्याह करवाए. जन्मदिन, मुंडन-क्या नहीं निभाया.  खैर, अब तो सब निबट गया. बच्चे अपनेअपने घर में सुख से रह रहे हैं. उन्हें भी मानसम्मान देते हैं. हां, एक कसक जरूर रह गई. अपने मकान की. वही नहीं बन पाया. बड़ा चाव था उन्हें अपने मकान का.  मनपसंद रसोई, बड़ा सा लौन, पीछे आंगन, तुलसीचौरा, सूरज की धूप की रोशनी, खिड़की से छन कर आती चांदनी और खिड़की के नीचे बनी क्यारी व उस क्यारी में लगी मधुमालती की बेल.

वे बैठेबैठे बोर होतीं. करने को कुछ था नहीं. एक दिन उन्होंने कबूतरी की आवाज देर तक सुनी. वह एक ही जगह बैठी रहती. अनिरुद्ध उन के कमरे में आया तो अतिउत्साहित, अति उत्तेजित स्वर में बोला, ‘‘बड़ी मां, कबूतरी ने घोंसले में अंडा दिया है.’’

‘‘इसे छूना मत. कबूतरी अंडे को तब तक सहेजती रहेगी जब तक उस में से बच्चे बाहर नहीं आ जाते.’’

अनिरुद्ध पीछे हट गया था. उन्हें इस परिवार से लगाव सा हो गया था. जैसे मां अपने बच्चे के प्रति हर समय आशंकित सी रहती है कि कहीं उस के बच्चे को चोट न लग जाए, वैसे ही उन्हें भी हर पल लगता कि इन कबूतरों के उठनेबैठने से यह अंडा मात्र 4 इंच की जगह से नीचे न गिर जाए. एक दिन उस अंडे से एक बच्चा बाहर आया. सिर्फ उस की चोंच, आंखें और पंजे दिखाई दे रहे थे. अब कबूतर का काम और बढ़ गया था. वह उड़ता हुआ जाता और दाना ले आता. कबूतरी, एकएक दाना कर के उस बच्चे को खिलाती जाती. सिद्धेश्वरीजी ने अनिरुद्ध से कह कर उन कबूतरों के लिए वहीं खिड़की पर, 2 सकोरों में दाने और पानी की व्यवस्था करा दी थी. अब कबूतर का काम थोड़ा आसान हो गया था.

सिद्धेश्वरीजी अनजाने ही उस कबूतर जोड़े की तुलना खुद से करने लगी थीं. ये पक्षी भी हम इंसानों की तरह ही अपने बच्चों के प्रति समर्पित होते हैं. फर्क यह है कि हमारे सपने हमारे बच्चों के जन्म के साथ ही पंख पसारने लगते हैं. हमारी अपेक्षाएं और उम्मीदें भी हमारे स्वार्थीमन में छिपी रहती हैं. इंसान का बच्चा जब पहला शब्द मुंह से निकालता है तो हर रिश्ता यह उम्मीद करता है कि उस प्रथम उच्चारण में वह हो. जैसे, मां चाहती है बच्चा ‘मां’ बोले, पापा चाहते हैं बच्चा ‘पापा’ बोले, बूआ चाहती हैं ‘बूआ’ और बाबा चाहते हैं कि उन के कुलदीपक की जबान पर सब से पहले ‘बाबा’ शब्द ही आए. हम उस के हर कदम में अपना बचपन ढूंढ़ते हैं. अपनी पसंद के स्कूल में उस का ऐडमिशन कराते हैं.

यह हमारा प्रेम तो है पर कहीं न कहीं हमारा स्वार्थ भी है. उस का भविष्य बनाने के लिए किसी अच्छे व्यावसायिक संस्थान में उसे पढ़ाते हैं. उस की तरक्की से खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं. समाज में हमारी प्रतिष्ठा बढ़ती है. हम अपनी मरजी से उस का विवाह करवाना चाहते हैं. यदि बच्चे अपना जीवनसाथी स्वयं चुनते हैं तो हमारा उन से मनमुटाव शुरू हो जाता है, हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा को बट्टा जो लग जाता है. हमारी संवेदनाओं को ठेस पहुंचती है. बच्चे बड़े हो जाते हैं, हमारी अपेक्षाएं वही रहती हैं कि वे हमारे बुढ़ापे का सहारा बनें. हमारे उत्तरदायित्व पूरे करें. हमारे प्रेम, हमारी कर्तव्यपरायणता के मूल में कहीं न कहीं हमारा स्वार्थ निहित है. कुछ दिन बाद उस बच्चे के छोटे पंख दिखाई देने लगे. फिर पंख थोड़े और बड़े हुए. अब उस ने स्वयं दाना चुगना शुरू कर दिया था. फिर एक दिन उस के मातापिता उसे साथ ले कर उड़ने लगे. तीनों विहंग छोटा सा चक्कर लगाते और फिर लौट आते वापस अपने नीड़ में.

धीरेधीरे सिद्धेश्वरीजी की तबीयत सुधरने लगी. अब वे घर में चलफिर लेती थीं. अपना काम भी स्वयं कर लेती थीं. रमानंदजी को नाश्ता भी बना देती थीं. घर के कामों में शालिनी की सहायता भी कर देती थीं. अब यह घर उन्हें अपना सा लगने लगा था. दिन स्वाति उन्हें अस्पताल ले गई. मोच तो ठीक हो गई थी. फिजियोथेरैपी करवाने के लिए डाक्टर ने कहा था, सो प्रतिदिन स्वाति ही उन्हें ले जाती. वापसी में समीर अपनी गाड़ी भेज देता. अब ये सब भला लगता था उन्हें.

एक दिन उन्होंने देखा, कबूतर उड़ गया था. वह जगह खाली थी. अब वह नीड़ नहीं मात्र तिनकों का ढेर था. क्योंकि नीड़ तो तब था जब उस में रहने वाले थे. मन में अनेक सवाल उठने लगे, क्या वह बच्चा हमेशा उन के साथ रहेगा? क्या वह बड़ा हो कर मातापिता के लिए दाना लाएगा? उन की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाएगा? इसी बीच उन के मस्तिष्क में एक ऋषि और राजा संवाद की कुछ पंक्तियां याद आ गई थीं. ऋषि ने राजा से कहा था, ‘‘हे राजा, हम मनुष्य अपने बच्चों का भरणपोषण करते हैं, परंतु योग माया द्वारा भ्रमित होने के कारण, उन बच्चों से अपेक्षाएं रखते हैं. पक्षी भी अपने बच्चों को पालते हैं पर वे कोई अपेक्षा नहीं रखते क्योंकि वे बुद्धिजीवी नहीं हैं और न ही माया में बंधे हैं.’’

उन्होंने खिड़की खोल कर वहां सफाई की और घोंसला हटा दिया. धीरेधीरे तेज हवाएं चलने लगीं. उन्होंने खिड़की बंद कर दी. कुछ दिन बाद कबूतर का एक जोड़ा फिर से वहां आ गया. अपना नीड़ बनाने. वे मन ही मन सुकून महसूस कर रही थीं. अब फिर घोंसला बनेगा, कबूतरी अंडे देगी, उन्हें सेना शुरू करेगी, अंडे में से चूजा निकलेगा, फिर पर निकलेंगे और फिर कबूतर उड़ जाएगा और कपोत का जोड़ा टुकुरटुकुर उस नीड़ को निहारता रह जाएगा, उदास मन से. ठंड बढ़ने के साथसाथ मोच वाले स्थान पर हलकी सी टीस एक बार फिर से उभरने लगी थी. परिवार में उन की हालत सब के लिए चिंता का विषय बनी हुई थी. रमानंदजी आयुर्वेद के तेल से उन के टखनों की मालिश कर रहे थे. स्वाति ने एक अन्य डाक्टर से उन के लिए अपौइंटमैंट ले लिया था. सिद्धेश्वरीजी ने उसे रोकने की कोशिश की, तो वह उन्हें चिढ़ाते हुए बोली, ‘‘बड़ी मां, टांग का दर्द ठीक होगा तभी तो गांव जाएंगी न.’’

स्वाति समेत सभी खिलखिला कर हंसने लगे थे. नौकर गरम पानी की थैली दे गया तो सिद्धेश्वरीजी पलंग पर लेट कर सोचने लगीं, ‘सही कहते हैं बड़ेबुजुर्ग, घर चारदीवारी से नहीं बनता, उस में रहने वाले लोगों से बनता है.’ घोंसला अवश्य उन का अस्थायी रहा पर वे तो भरीपूरी हैं. बेटेबहू, पोतेपोती से खुश, संतप्त भाव से एक नजर उन्होंने रमानंदजी की दुर्बल काया पर डाली, फिर दुलार से हाथ फेरती हुई बुदबुदाईं, ‘उन का जीवनसाथी तो उन के साथ है ही, उन के बच्चे भी उन के साथ हैं. अब उन्हें किसी नीड़ की चाह नहीं. जहां हैं सुख से हैं, संतुष्ट और संतप्त.’ उन्होंने कामवाली बाई से कह कर बक्से में से सामान निकलवाया और अलमारी में रखवा दिया. और फिर मीठी नींद के आगोश में समा गईं.

Monday, March 30, 2026

धन की भेंट ............(रवींद्रनाथ टैगोर)

 वृन्दावन कुण्डू क्रोधावेश में अपने पिता के पास आकर कहने लगा- ''मैं इसी समय आपसे विदा होना चाहता हूं।''

उसके पिता जगन्नाथ कुण्डू ने घृणा प्रकट करते हुए कहा- ''अभागे! कृतघ्न! मैंने जो रुपया तेरे पालन-पोषण पर खर्च किया है, उसे चुका कर ही ऐसी धमकी देना।'
जिस प्रकार का खान-पान जगन्नाथ के घर चला करता था उस पर कुछ अधिक व्यय न होता था। भारत के प्राचीन ऋषि मितव्ययता के लिए ऐसी ही वस्तुओं का प्रबन्ध कर लिया करते थे। जगन्नाथ के व्यवहार से ज्ञात होता था वह इस विषय में उन ऋषियों ही के निर्मित आदर्शों पर चलना पसन्द करता था। यद्यपि वह पूर्णरूप से इस आदर्श को निबाहने में असमर्थ था। इसका कारण कुछ यह समझा जा सकता है कि जिस समाज में उसका रहन-सहन था वह अपने प्राचीन आदर्शों से बहुत पतित हो चुका था और कुछ यह कि उसकी आत्मा को शरीर के साथ मिलाये रखने के विषय में प्रकृति की उत्तेजना तीव्र और युक्तियुक्त-संगत थी।
जब तक वृन्दावन अविवाहित था, उसका निर्वाह जैसे-तैसे चलता रहा, किन्तु विवाह के पश्चात् उसने सीमा से बाहर इस उत्तम और सुन्दर आदर्श को, जो उसके महामना पिता ने निर्मित कर रखा था, त्यागना शुरू कर दिया। ऐसा ज्ञात होता था कि सांसारिक सुख-ऐश्वर्य के सम्बन्ध में उसके विचार आध्यात्मिकता से शारीरिकता की ओर परिवर्तित हो रहे हैं और खाने-पीने की न्यूनता से उसे भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी और जो कष्ट भी सामने आते हैं, उसने उन्हें सहना पसन्द न करके संसार के साधारण व्यक्तियों के आचरण का अनुकरण करना आरम्भ कर दिया।
जब से वृन्दावन ने अपने पिता के निर्मित उच्च आदर्श को त्यागा, तभी से पिता और पुत्र में कलह आरम्भ हो गई। इस कलह ने चरम-सीमा का रूप उस समय धारण किया, जब वृन्दावन की पत्नी अधिक रुग्ण हुई और उसकी चिकित्सा के लिए एक वैद्यराज बुलाया गया। यहां तक का व्यवहार भी क्षमा करने के योग्य था; किन्तु जब वैद्यराज ने रोगी के लिए एक अधिक मूल्य की औषधि का निर्णय किया, तो जगन्नाथ ने समझ लिया कि वैद्यराज अयोग्य है और वैद्यक के नियमों से बिल्कुल अपरिचित। बस उसने उसी समय उनको मकान से बाहर निकलवा दिया। वृन्दावन ने पहले तो पिता से काफी अनुनय-विनय की कि औषधि जारी रहे-फिर झगड़ा भी किया, परन्तु पिता के कान पर जूं तक न रेंगी। अन्त में जब पत्नी स्वर्ग सिधर गई तो वृन्दावन का क्रोध अधिक बढ़ गया और उसने अपने पिता को उसका प्राण-घातक ठहराया।
जगन्नाथ ने स्वभावानुसार उसको समझाने का बहुत प्रयत्न किया और कहा- ''तुम कैसी नामसझी की बातें करते हो? क्या लोग विभिन्न प्रकार की औषधि खाकर नहीं मरते; यदि मूल्यवान औषधियां ही मनुष्य को जीवित रख सकती तो बड़े-बड़े राजा-महाराजा क्यों मरते? इससे पहले तुम्हारी मां और दादी मर चुकी हैं, बहू भी मर गई तो क्या हुआ? समय आने पर प्रत्येक व्यक्ति को यहां से कूच करना है।''
वृन्दावन यदि इस प्रकार दु:खी और सचेत होकर वास्तविक परिणाम पर पहुंचने में योग्य न होता, तो सम्भव था कि वह इन बातों से कुछ सान्त्वना प्राप्त कर लेता। इससे पहले मरने के समय उसकी मां और दादी ने औषधि न पी थी और औषधि सेवन न करने की यह रीति बहुत पहले से इस खानदान में चली आई है। नई पौध का चरित्र इतना बिगड़ चुका है कि वह पुराने ढंग पर मरना भी पसन्द नहीं करती।
जिस युग की चर्चा हम कर रहे हैं, उन दिनों अंग्रेज भारत में नए-नए आये थे; किन्तु उस समय भी इस देश के बड़े-बूढ़े अपनी-अपनी औलाद के स्वभाव-विरुध्द ढंग पर आश्चर्य और विकलता प्रकट किया करते और अन्त में जब उनकी एक न चलती तो अपने मुंह से लगे हुए हुक्कों से सान्त्वना प्राप्त करने का प्रयत्न करते।
वास्तविकता यह है कि जिस समय मामला चरम-सीमा को पहुंच गया तो वृन्दावन से न रहा गया और उसने आवेश तथा विकलता के साथ अपने पिता से कहा-''मैं जाता हूं।''
पिता ने उसे दृढ़ देखकर उसी समय आज्ञा दे दी।
और घोषणा करते हुए कह दिया- ''चाहे देवता मेरे ढंग को गौहत्या के समान क्यों न समझें, मैं शपथ खाकर कहता हूं कि तुम्हें अपनी धन-संपत्ति से एक कौड़ी भी नहीं दूंगा।''
''यदि मैं तुम्हारी एक पाई तक को भी हाथ लगाऊं तो उस व्यक्ति से भी नीच होऊंगा जो अपनी मां को बुरे भाव से देखता है।'' वृन्दावन के मुख से आवेश में निकल गया।
गांव के निवासियों ने अपने-जैसे विचारों के, लम्बे-चौड़े वाद-विवाद के पश्चात् उस छोटे-से परिवर्तन-भरे झगड़े को संतोषपूर्वक देखा। जगन्नाथ ने चूंकि अपने बेटे को अपनी संपत्ति से वंचित कर दिया था, अत: प्रत्येक व्यक्ति उसे सान्त्वना देने का प्रयत्न कर रहा था। वे सब इस विषय में सहमत थे कि केवल पत्नी की खातिर पिता के साथ झगड़ा करने का दृश्य इस नए युग में ही देखा जा सकता है। इसके सम्बन्ध में वे स्वयं जो कारण बताते थे वे भी बहुत असंगत थे। वे कहते थे यदि किसी की पत्नी मर जाये तो बड़ी सरलता से दूसरी प्राप्त कर सकता है, पिता मर जाये तो संसार-भर के धन-ऐश्वर्य के बदले में भी उसे प्राप्त नहीं कर सकता।
इस बात में सन्देह नहीं कि उनका उपदेश हर प्रकार से ठीक था; किन्तु हमें सन्देह है कि दूसरा पिता प्राप्त करने की पीड़ा उस पथ-भ्रष्ट बेटे को कहां तक प्रभावित कर सकती थी। इसके विरुध्द हमारा विचार यह है कि ऐसा अवसर आता तो वह उसे ईश्वरीय अनुकम्पा में सम्मिलित समझता।
वृन्दावन के अलग होने का दु:ख उसके पिता जगन्नाथ को तनिक भी अनुभव न हुआ। इसके कुछ विशेष कारण थे। एक तो यह कि उसके चले जाने से घर का खर्च कम हो गया, दूसरे हृदय से एक भारी चिन्ता दूर हो गई, हर समय उसे इस बात का भय रहता था कि मेरा बेटा मुझे विष देकर न मार दे। जब कभी वह अपना थोड़ा-सा भोजन करने बैठता तो यही विचार उसे विकल कर देता कि इसमें विष न मिला हुआ हो। यही चिन्ता किसी सीमा तक वृन्दावन की पत्नी का स्वर्गवास हो जाने पर दूर हो गई थी, किन्तु अब वह बिल्कुल ही न रही।
जिस प्रकार घने अंधियारे बादलों में चमकीली बिजली और भयंकर तूफानी समुद्र में बहुमूल्य रत्न विद्यमान रहते हैं, उसी प्रकार बूढ़े जगन्नाथ के कठोर हृदय में भी एक निर्बलता शेष थी। वृन्दावन जाते समय अपने साथ अपने चार-वर्षीय पुत्र गोकुलचन्द्र को भी ले गया था। चूंकि उसकी खुराक और वस्त्रों का खर्च बहुत न्यून था इसलिए जगन्नाथ को उससे बहुत प्रेम था। जाते समय जब वृन्दावन उसे अपने साथ ले गया तो सबसे पहले दु:ख और पछतावे की अपेक्षा उसने अपने मन में हिसाब करना शुरू किया कि इन दोनों के चले जाने से खर्च में कितनी कमी हो जाएगी। इस बचत की वार्षिक रकम कहां तक पहुँचेगी और इस बचत को यदि किसी रकम का सूद समझा जाए तो उसका मूलधन कितना हो सकेगा?
जब तक गोकुलचन्द घर में था वह अपनी चंचलता से जगन्नाथ का ध्यान अपनी ओर आकर्षित रखता था; परन्तु उसके चले जाने पर कुछ दिनों में ही बूढ़े को ऐसा अनुभव होने लगा कि घर काटने को दौड़ता है। इससे पहले जिस समय जगन्नाथ पूजा-पाठ में तल्लीन होता तो गोकुलचन्द उसे छेड़ा करता। भोजन करते समय उसके आगे से रोटी या चावल उड़ाकर भाग जाता और स्वयं खा लेता और जब वह आय-व्यय लिखने बैठता तो उसकी दवात लेकर दौड़ जाता, किन्तु अब उसके चले जाने पर ये सब बातें भी दूर हो गईं। जीवन में प्रतिदिन का क्रिया-कर्म उसे भार अनुभव होने लगा। उसे ऐसा मालूम होता था कि इस प्रकार का विश्राम भविष्य के संसार में ही सहन किया जा सकता है। जब कभी वह गोकुल की चंचलता को स्मरण करता तो रजाइयों में उसके हाथों के छेदों या दरी पर कलम-दवात से उसके बनाए हुए भद्दे चित्रों को देखता तो उसका हृदय कष्ट के मारे बैठ जाता। जगन्नाथ को अपने सोने के कमरे में एक कोने के अन्दर पड़ी हुई पुरानी धोती के टुकड़े दिखाई पड़े तो सहसा उसके नेत्रों से अश्रु बह निकले। वह धोती थी जिसे गोकुल ने दो वर्ष के अल्प समय में फाड़ दिया था तो जगन्नाथ ने उसे झिड़का और बुरा-भला कहा था। किन्तु अब उसने इन टुकड़ों को उठाकर बड़ी सावधानी से अपने सन्दूक में रख लिया और इसकी शपथ खा ली कि यदि गोकुल उसके जीते-जी फिर कभी वापस आ गया तो चाहे वह हर वर्ष एक धोती फाड़े, वह उससे कभी रुष्ट न होगा।
परन्तु गोकुल को न वापस आना था, न आया। गरीब जगन्नाथ दिन-प्रतिदिन वृध्द होता जा रहा था और उसको खाली घर अधिक-से-अधिक भयावना दिखाई पड़ता था।
अन्त में दशा यहां तक पहुंची कि वह सन्तोष से घर में बैठ भी न पाता। मध्यान्ह समय जब गांव के सब लोग अपने-अपने घरों में सोए होते तो जगन्नाथ नारियल हाथ में लिये गलियों में घूमता दिखाई देता। गांव के लड़के जब कभी उसे अपनी ओर आता देखते तो खेल छोड़कर दूर जा खड़े होते और इस प्रकार की पद्य-पंक्ति गाने लगते जिसमें एक स्थानीय कवि ने वृध्द जगन्नाथ के मितव्ययी स्वभाव की प्रशंसा की थी। कोई व्यक्ति भय के मारे उसका वास्तविक नाम इस डर से जबान पर न लाता कि कहीं उसे उस रोज अन्न-जल प्राप्त न हो। अत: लोगों ने उसके अनेक प्रकार के नाम रख छोड़े थे। वृध्द उसे जगन्नाथ कहा करते थे, परन्तु मालूम नहीं छोटे लड़के उसे चिड़ियल क्यों कहते थे। सम्भव है इसका कारण यह हो कि उसका चर्म शुष्क और शरीर रक्तहीन दिखाई देता था। इन्हीं कारणों से वह प्रेत-आत्माओं के समान समझा जाता था।

2
एक दिन मध्यान्ह-समय जब जगन्नाथ स्वभावानुसार गांव की गलियों में आम के छतनारे वृक्षों के नीचे अपना नारियल हाथ में लिये फिर रहा था। उसने देखा कि एक लड़का जो देखने में अपरिचित मालूम होता था, गांव के लड़कों का मुखिया बना हुआ है और उन्हें कोई नई शरारत समझा रहा है। उसके महान चरित्र और उसकी कुशाग्र बुध्दि से प्रभावित होकर सब लड़कों ने इस बात का नियम कर लिया था कि हर काम में उसकी आज्ञानुसार आचरण करेंगे। दूसरे लड़कों की भांति वह वृध्द जगन्नाथ को अपनी ओर आता देखकर भय से भागा नहीं, बल्कि उसके समीप जाकर चादर झाड़ने लगा। उसी समय उसमें से एक जीवित छिपकली निकलकर वृध्द के शरीर पर गिरी और उसकी पीठ की ओर से नीचे उतरकर वन की ओर भाग गई। भय से वृध्द के हाथ-पांव कांपने लगे। यह देखकर सब लड़के बहुत प्रसन्न हुए और प्रसन्नता से उच्च-स्वर में घोष करने लगे। वृध्द जगन्नाथ बड़बड़ाता और गालियां देता हुआ बहुत दूर निकल गया, किन्तु वह अंगोछा जो प्राय: उसके कन्धों पर पड़ा रहा करता था, सहसा गायब हो गया और दूसरे ही क्षण उस अपरिचित लड़के के सिर पर बंधी हुई पगड़ी के रूप में दिखाई देने लगा।
लड़के की ओर से इस प्रकार की चेष्टा देखकर जगन्नाथ पहले तो कुछ चिन्तित हुआ, फिर वह गांव की प्रतिदिन की कठोरता को इस प्रकार पराजित होते देखकर प्रसन्न भी हुआ। काफी दिनों से लड़के उसकी छाया ही देखकर दूर भाग जाया करते थे और उसे उनसे बोलने तथा बातचीत करने का अवसर ही न मिलता था। अपरिचित लड़का इस शरारत के पश्चात् दूर भाग गया था, किन्तु बहुत से वचन और सांत्वना देने के पश्चात् वह उस वृध्द के समीप आया। फिर दोनों में निम्न बातें होने लगीं।
''बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?''
''नितईपाल।''
'घर कहां है?''
''मैं नहीं बताऊंगा।''
''क्यों नहीं बतलाओगे?''
''मैं घर से भागकर आया हूं।''
''भागे क्यों थे?''
''मेरा पिता मुझे स्कूल जाने को कहता था।''
जगन्नाथ के हृदय में विचार आया, ऐसे होनहार लड़के को स्कूल भेजना कैसी व्यर्थ की बात है? वह कैसा लड़के के भविष्य के परिणाम की ओर से आंखें मीचे रहने वाला पिता होगा, जो इसे स्कूल भेजना चाहता है।
थोड़ी देर पश्चात् वह कहने लगा- ''अच्छा, तुम मेरे घर रहना पसन्द करोगे!''
लड़के ने उत्तर दिया- ''क्यों नहीं।''
उसी दिन से वह लड़का उसके घर रहने लगा। उसे घर में प्रवेश करते हुए इतना भी भय न हुआ, जितना अंधेरे में किसी वृक्ष के नीचे जाने से हो सकता है। इतना ही नहीं, बल्कि उसने अपने वस्त्र और भोजन के विषय में ऐसे निर्भयतापूर्ण ढंग पर प्रश्न करने आरम्भ किये जैसे वह उस घर में वर्षों से परिवार का अंग रहा है। यदि कोई वस्तु उसकी इच्छानुसार न होती तो वह जगन्नाथ से झगड़ा आरम्भ कर देता। जगन्नाथ अपने बेटे को तो डरा-धमका भी लेता, परन्तु उसे बस में लाना सरल न था। उसे उसकी हर बात माननी पड़ती।
गांव के लोग आश्चर्य में थे कि जगन्नाथ ने नितईपाल को क्यों इस प्रकार सिर पर चढ़ा रखा है। यह सर्वविदित था कि वृध्द अब कुछ दिन नहीं तो कुछ सप्ताह का अतिथि है और वे इस बात को सोचकर बहुत दुखित होते थे कि उसके स्वर्ग सिधरने पर उसकी संपत्ति का अधिकारी यही लड़का होगा। वे सब इस बात पर लड़के से ईष्या करने लगे थे। उन्होंने यह भी निश्चय कर लिया कि उसे अवश्य हानि पहुंचाने का प्रयत्न करेंगे; परन्तु जगन्नाथ उसकी ऐसी निगरानी रखता जैसे वह उसकी पसली की हड्डी हो।
कभी-कभी लड़का धमकी देकर कहता- 'मैं घर चला जाऊंगा' ऐसे अवसर पर वृध्द लोभ-लालच का जाल बिछाकर कहता- 'मैं अपनी सारी संपत्ति तुमको ही दे दूंगा।' लड़का हर प्रकार से कम आयु का था, तब भी इस वचन के महत्व को खूब समझता था।
गांव वालों से और कुछ न हो सकता था उन्होंने उस लड़के के बाप के सम्बन्ध में जांच आरम्भ की। उनको यह सोचकर बहुत दु:ख होता था कि उसके माता-पिता उसकी याद में दुखी होंगे। लड़का बड़ा चंचल है, जो उन्हें इस प्रकार छोड़कर भाग आया। वे इसे हजार-हजार गालियां देते होंगे। किन्तु ये सब बातें वे जिस आवेश में करते थे इससे स्पष्ट प्रतीत होता था कि वे न्याय नहीं ईष्या से काम ले रहे हैं।
एक दिन वृध्द को किसी बटोही की जबानी ज्ञात हुआ कि दामोदरपाल अपने बेटे की खोज में समीप के गांवों और कस्बों में फिर रहा है, और कुछ ही समय में वह इस गांव में आना चाहता है। नितई ने जब यह बात सुनी तो सहज भाव से उसके हृदय के प्रेम में आवेश आया। वह उद्विग्नता की दशा में धन-संपत्ति छोड़कर अपने पिता के पास जाने को तैयार हो गया। जगन्नाथ उसे रोकने के लिए प्रत्येक सम्भव रीति से प्रयत्न करता था। अत: उसने कहा- ''तुम अपने पिता के पास जाओगे तो वह तुम्हें पीटेगा, मैं तुम्हें एक ऐसे स्थान पर छिपा दूंगा कि किसी को भी तुम्हारा पता न मिल सके; यहां तक कि गांव वाले भी मालूम न कर सकेंगे।''
इस बात से लड़के के हृदय में आश्चर्य उत्पन्न हुआ और वह कहने लगा- ''बाबा! मुझे कहां छिपाओगे? ऐसा भला स्थान तो मुझे भी दिखा दो।''
जगन्नाथ ने उत्तर दिया- ''यदि वह स्थान मैं इस समय दिखा दूं तो लोगों को खबर हो जाएगी, रात हो जाने दो।'' बच्चों में आश्चर्य-जनक स्थान देखने की उत्कट लालसा होती है, नितई भी उसी तरह यह बात सुनकर प्रसन्न हुआ। उसने अपने हृदय में विचारा कि जब मेरे पिता मेरी खोज करने के पश्चात् वापस चले जाएंगे तो मैं दौड़ लगाकर लड़कों के साथ उस स्थान पर आंख-मिचौनी खेला करूंगा और कोई मालूम न कर सकेगा कि मैं कहां छिपा हूं- वास्तव में उस समय बड़ा आनन्द आयेगा। पिताजी सम्पूर्ण गांव छान मारेंगे और मुझे कहीं न पा सकेंगे, बड़ी दिल्लगी होगी।
मध्यान्ह के समय जगन्नाथ लड़के को कुछ समय के लिए मकान में बन्द करके कहीं चला गया। उसके वापस आने पर नितई ने उससे इतने प्रश्न किए कि वह परेशान हो गया।
अन्त में जब रात हुई तो नितई कहने लगा- ''बाबा, अब तो वह स्थान मुझको दिखा दो।''
जगन्नाथ ने उत्तर दिया- ''अभी रात नहीं हुई।''
इसके कुछ समय पश्चात् लड़के ने फिर कहा- ''बाबा, अब रात बहुत हो गई है, अब तो चलो।''
जगन्नाथ ने धीरे से कहा- ''अभी गांव के लोग सोए नहीं हैं।''
नितई फिर एक क्षण के लिए रुका और बोला- ''बाबा! इस समय तो सब लोग सो गये हैं, आओ अब चलें।''
रात बहुत जा चुकी थी। गरीब लड़का इतनी देर तक कभी न जागा था, इसलिए उसको जागे रहने में बड़ी कठिनाई पड़ रही थी। अन्त में आधी रात के समय जगन्नाथ लड़के की बांह पकड़कर स्वप्निल गांव की अंधेरी गलियों से रास्ता टटोलता बाहर निकला। सब दिशाएं सूनी थीं, चारों ओर सूनापन था, कभी-कभी कोई कुत्ता भोंकने लगता तो और कुत्ते भी उसके साथ मिलकर भोंकना आरम्भ कर देते। इसके अतिरिक्त कहीं-कहीं उसके पैरों की आहट से कोई पक्षी वृक्ष की टहनी से पंख फड़फड़ाता हुआ उड़ जाता। नितई भय से कांप रहा था किन्तु जगन्नाथ ने उसका हाथ दृढ़ता से पकड़ा हुआ था।
कई खेतों में से होकर अन्त में ये लोग जंगल में प्रविष्ट हुए। यहां एक जीर्ण मन्दिर खड़ा हुआ था, जिसमें किसी भी देवता की मूर्ति दिखाई न पड़ती थी।
नितई ने उसे देखकर निराशा- भरे स्वर में कहा-''बस, यही स्थान था?''
यह स्थान उसकी कल्पना से सर्वथा भिन्न था; क्योंकि उसमें कोई आश्चर्य की बात न थी। जब से वह घर से भागा था अनेक बार ऐसे खंडहर मन्दिरों में रातें व्यतीत कर चुका था। इतना होने पर भी आंख-मिचौनी खेलने के लिए यह स्थान सुन्दर था अर्थात् ऐसा कि उसके साथ खेलने वाले लड़के यहां उसकी खोज न कर सकते थे।
जगन्नाथ ने फर्श के बीच से एक पत्थर की सिल उठाई। उसके नीचे आश्चर्य- चकित लड़के को एक तहखाना दिखाई दिया, जिसमें एक धीमा-सा दीप जल रहा था। भय और आश्चर्य दोनों बातें उसके हृदय पर जमी हुई थीं। अन्दर एक बांस की सीढ़ी खड़ी थी। जगन्नाथ नीचे उतरा और नितई भी उसके पीछे हो लिया।
नीचे उतरकर लड़के ने इधर-उधर देखा तो उसे चारों ओर पीतल के टोकने पड़े हुए दिखाई दिए। उसके मध्य में एक आसन बिछा हुआ था और सामने थोड़ा सिन्दूर, घिसा हुआ चन्दन, कुछ जंगली फूल और पूजा की शेष सामग्री रखी हुई थी। लड़के ने अपनी जिज्ञासा-पूर्ति के लिए उन टोकनों में से कुछ के अन्दर हाथ डाला और जब बाहर हाथ निकालकर देखा तो मालूम हुआ कि उनमें रुपये और सोने की मोहरें भरी हुई हैं। इतने में वृध्द जगन्नाथ ने नितई से कहा-''नितई, मैंने तुमसे कहा था न कि अपनी सारी संपत्ति तुम्हें दे दूंगा, मेरे पास कोई अधिक संपत्ति नहीं है, किन्तु जो कुछ भी है वह इन पीतल के टोकनों में भरी है और यह सब मैं आज तुम्हारे हवाले करना चाहता हूं।''
नितई प्रसन्नता के मारे उछल पड़ा और बोला- ''सच! क्या तुम इनमें से एक रुपया भी अपने पास न रखोगे?''
वृध्द ने उत्तर दिया- ''यदि मैं इसमें से कुछ लूं तो भगवान करे मेरा वह हाथ कोढ़ी हो जाए-किन्तु यह संपत्ति मैं तुम्हें एक शर्त पर देता हूं। यदि कभी मेरा पोता गोकुलचन्द या उसका भी पोता या परपोता या उसकी औलाद में से कोई व्यक्ति भी इस रास्ते से होकर जाये तो तुम्हारे लिए अनिवार्य होगा कि यह सारी संपत्ति उसको सौंप दो।''
लड़के ने ध्यान से सोचा और निश्चय के साथ विचारा कि वृध्द पागल हो गया है। फिर कहने लगा- ''बहुत अच्छा, ऐसा ही करूंगा।''
जगन्नाथ ने कहा-''बस तो इस स्थान पर बैठ जाओ-''
''क्यों?''
''तुम्हारी पूजा की जाएगी।''
लड़के ने चकित होकर पूछा- ''यही रीति है!''
वृध्द ने उत्तर दिया- ''यही रीति है।''
लड़का उछलकर तुरन्त आसन पर बैठ गया। वृध्द जगन्नाथ ने उसके माथे पर चन्दन लगाया, भृकुटियों के मध्य सिंदुर की बिन्दी लगा दी, जंगली पुष्पों का हार उनके गले में डाला और कुछ मन्त्र उच्चारण करने लगा।
बेचारा नितई देवता की भांति आसन पर बैठा-बैठा उकता गया, क्योंकि उसकी पलकें नींद से भारी हो रही थीं। अन्त में उसने घबराकर कहा-''बाबा!''
परन्तु जगन्नाथ उत्तर दिए बिना ही मन्त्र पढ़ता रहा।
अन्त में मन्त्रों का सिलसिला समाप्त हुआ और जगन्नाथ ने बड़ी कठिनाई से एक टोकने को खींचकर लड़के के सम्मुख रखा और ये शब्द विवशता से उसके मुख से कहलवाये- ''मैं सच्चे हृदय से प्रतिज्ञा करता हूं कि इस सारी धन-संपत्ति को गोकुलचन्द कुण्डू या वृन्दावन कुण्डू वल्द जगन्नाथ कुण्डू या गोकुलचन्द कुण्डू के बेटे, पोते, परपोते; या उसकी औलाद के किसी व्यक्ति को जो इसका वास्तविक और योग्य उत्तराधिकारी होगा दे दूंगा।''
अनेक बार शब्दों के कहने में भोले लड़के की चेतना जाती रही और कण्ठ सूखने लगा।
जैसे-तैसे यह रस्म समाप्त हुई, गुफा की वायु, दीपक के धुएं और दोनों के सांस के कारण बुरी मालूम होने लगी। नितई को अपना कण्ठ मिट्टी की भांति सूखा और हाथ-पांव जलते हुए अनुभव हो रहे थे। बेचारे का दम घुटा जा रहा था।
दीपक धीरे-धीरे मध्दिम होता गया, यहां तक कि अन्तिम झोंका खाकर बुझ गया। इसके पश्चात् अंधेरा। नितई को ऐसा लगा कि वृध्द जल्दी-जल्दी सीढ़ी से ऊपर चढ़ रहा है। उसने घबराकर पूछा- ''बाबा तुम कहां जा रहे हो?''
जगन्नाथ ने निरन्तर ऊपर की ओर चढ़ते हुए उत्तर दिया- ''मैं अब जाता हूं, तुम यहां रहो, यहां तुम्हें कोई ढूंढ़ न सकेगा। वृन्दावन के बेटे और जगन्नाथ के पोते गोकुलचन्द का नाम याद रखना।''
इसके पश्चात् उसने ऊपर जाकर सीढ़ी खींच ली। लड़के ने अवरुध्द और दयनीय स्वर में कहा- ''मैं अब अपने पिता के पास जाना चाहता हूं, यहां मुझे भय लगता है।''
जगन्नाथ ने उसकी परवाह न करते हुए गुफा के मुंह पर पत्थर की शिला रख दी। इसके पश्चात् दोनों जंघाओं को मोड़कर झुका और अपने कान पत्थर के समीप लगाकर सुनने लगा। अन्दर से आवाज आई, ''बाबाजी! बाबाजी!'' फिर किसी भारी वस्तु के फर्श पर गिरने की आवाज सुनाई दी और इसके बाद निस्तब्धता छा गई।
इस प्रकार अपनी संपत्ति उसको सौंपकर वृध्द जगन्नाथ ने जल्दी-जल्दी पत्थर के ऊपर मिट्टी डालनी आरम्भ कर दी। उस पर उसने टूटी-फूटी ईंटें और चूना रख दिया और फिर मिट्टी बिछाकर उसमें जंगली घास और बूटियों की जड़ें गाड़ दीं।
रात सम्भवत: समाप्त हो चुकी थी। परन्तु वह उस स्थान से हटकर घर न जा सका, रह-रहकर अपना कान पृथ्वी पर लगाता और आवाज सुनने का प्रयत्न करता। ऐसा मालूम होता था कि अब भी उस गुफा के अन्दर या पृथ्वी की अथाह गहराइयों में से एक वेदनायुक्त क्रन्दन सुनाई दे रहा है। उसे ऐसा भान होता था कि रात में आकाश पर केवल वही एक आवाज छाई हुई है और संसार के सब व्यक्ति उस आवाज से जागकर बिस्तरों में बैठे उसे सुनने का प्रयत्न कर रहे हैं।...
पागल वृध्द आवेश में आकर और अधिक मिट्टी डाले जाता था। वह चाहता था कि उस आवाज को दबा दे; किन्तु इस पर भी रह-रहकर वह आवाज उसके कानों में आ रही थी- ''बाबाजी! हाय बाबाजी!''
उसने पूरी शक्ति से धरती पर पांव मारकर चिल्लाते हुए कहा- ''चुप रहो, लोग तुम्हारी आवाज सुन लेंगे।''
फिर भी उसे मालूम हुआ कि ''हाय बाबा जी! हाय बापू!'' की आवाजें रह-रहकर सुनाई दे रही हैं।
इतने में सूर्य उदय हुआ और जगन्नाथ कुण्डू मन्दिर को छोड़कर खेतों की ओर आ गया।
वहां भी किसी ने उसके पीछे से आवाज दी- ''बापू!'' घबराहट की दशा में जगन्नाथ ने पीछे फिरकर देखा तो उसका पुत्र वृन्दावन था।
वृन्दावन कहने लगा- ''मुझे पता चला है कि मेरा बेटा आपके घर में छिपा हुआ है, उसे मुझे दे दो।''
यह सुनकर वृध्द के नेत्र विस्तृत हो गये, मुंह चौड़ा हो गया और उसने मुड़कर पूछा-''क्या कहा? तुम्हारा बेटा?''
वृन्दावन ने कहा- ''हां, मेरा बेटा गोकुल, अब उसका नाम नितईपाल है और मैंने अपना नाम दामोदरपाल प्रसिध्द कर रखा है। तुम्हारी मनहूसी और कंजूसी की बात चारों ओर इतनी अधिक फैल चुकी थी कि विवश होकर मुझे अपना वास्तविक नाम बदलना पड़ा। वरना सम्भव था कि लोग हमारा नाम लेने से भी सकुचाते।''
वृध्द ने धीरे से दोनों हाथ सिर के ऊपर उठाए। उसकी उंगलियां इस प्रकार कांपने लगी, मानो वह वायु में किसी अदृश्य वस्तु के पकड़ने का प्रयत्न कर रही हों। फिर वह अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। जब उसे चेत हुआ तो वह अपने बेटे की बांह पकड़कर उसे घसीटता हुआ पुराने मन्दिर के समीप ले गया और पूछने लगा-''तुम्हें इसके अन्दर से रोने की आवाज सुनाई देती है?''
वृन्दावन ने उत्तर दिया-''नहीं?''
वृध्द ने कहा- ''ध्यान से सुनो, कोई आवाज अन्दर से 'बाबाजी! बाबा जी!' कहती सुनाई नहीं देती?''
वृन्दावन ने फिर कान लगाकर उत्तर दिया- ''नहीं।''
इससे वृध्द जगन्नाथ की चिन्ता किसी सीमा तक दूर हो गई, साथ ही उसके मस्तिष्क ने भी उसे जवाब दे दिया।
उस दिन के पश्चात् उसकी दशा यह थी कि गांव में आवारा फिरता और लोगों से पूछा करता- ''तुम्हें किसी के रोने की आवाज तो नहीं सुनाई देती?''
लोग उसके पागलपन पर ठहाका लगाते।
इसके लगभग चार वर्ष पश्चात् जगन्नाथ मृत्यु-शैया पर पड़ा था। संसार का प्रकाश धीरे-धीरे उसके नेत्रों के सामने से दूर होता जा रहा था और सांस अधिक कष्ट से आने लगी थी। सहसा वह विक्षिप्त अवस्था में उठकर बैठ गया। उसने अपने दोनों हाथ ऊपर को उठा लिये और वायु में इस प्रकार चलाने लगा जैसे किसी वस्तु को टटोल रहा हो और कहने लगा-''मेरी सीढ़ी किसने उठा ली?''
उस भयानक बन्दी-गृह में से, जहां न देखने को प्रकाश और न सांस लेने के लिए वायु थी, बाहर निकलने के लिए सीढ़ी न पाकर वह फिर अपनी मृत्यु-शैया पर गिर पड़ा और जहां संसार की स्थायी आंख-मिचौनी के खेल में कोई छिपने वाला पाया नहीं गया उस श्रेणी में लोप हो गया।

Sunday, March 29, 2026

कठपुतलियाँ ........(मनीषा कुलश्रेष्ठ)

 गना जब-जब कोठरी के अंदर-बाहर जाती, दरवाज़े के पीछे लटकी कठपुतलियां उससे टकरा जातीं... उसे रोकतीं अपनी कजरारी, तीखी, फटी-फटी आंखों से, चमाचम गोटे के लहंगों वाली रानियां, नर्तकियां और अंगरखे-साफे वाले, आंके-बांके, राजा-महाराजा और घोड़े पर सवार सेनापति। ढोलकी वाला विदूषक और सारंगी वाली उसकी साथिन। दीवाना मजनूं और नकाब वाली उसकी लैला। कभी सुगना उदास होती तो इन कठपुतलियों का एक साथ ढेर बनाकर ताक पर रख देती और सांकल लगाकर गुदड़ी पर ढह जाती। कभी गुस्सा होती तो ज़ोर से झिंझोड़ देती सबके धागे।

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