अपने ही बुने जालों में फंसा मन
जाने कब शांति को कहाँ दूर छोड़ आया?
"कुछ" और पाने की चाह में
मिले को भी गंवाता जाता
पर ये "कुछ" और परिभाषित क्यों नहीं हो पाता ?
कहाँ जाकर रुकेगी
अनजान राहों पर चलने की मन की फिसलन ?
राकेश
Choriyaan... Zindagi Ke Alag Alag Rangon Ki ..Jazbaaton Ki
अपने ही बुने जालों में फंसा मन
जाने कब शांति को कहाँ दूर छोड़ आया?
"कुछ" और पाने की चाह में
मिले को भी गंवाता जाता
पर ये "कुछ" और परिभाषित क्यों नहीं हो पाता ?
कहाँ जाकर रुकेगी
अनजान राहों पर चलने की मन की फिसलन ?
राकेश
हम उस दौर में जी रहे हैं जहाँ 'शांति' भी एक टास्क बन गई है—हम शांत होने के लिए भी ऐप्स डाउनलोड करते हैं या वीकेंड का इंतजार करते हैं। लेकिन हमारे बुजुर्ग जानते थे कि शांति खरीदी नहीं, चुराई जाती है। दिन के चौबीस घंटों में से सिर्फ दो मिनट चुराकर खुद को वापस खुद से जोड़ने की इसी कला को 'माइक्रो-ग्राउंडेडनेस' कहते हैं, "माइक्रो-ग्राउंडेडनेस (Micro-Groundedness)" का सीधा सा मतलब है—भागदौड़ और तनाव के बीच, सिर्फ 2 मिनट के लिए ठहरकर खुद को वापस शांत और संतुलित करना। अक्सर जब हम तनाव में होते हैं, तो लोग कहते हैं, "आधे घंटे के लिए ध्यान (Meditation) लगाओ" या "योग करो।" लेकिन आज की व्यस्त जिंदगी में हर किसी के पास तुरंत आधा घंटा नहीं होता। यहीं पर काम आता है 'माइक्रो-ग्राउंडेडनेस'। यह आपके दिन को बिना रोके, रीसेट बटन दबाने जैसा है।
'ग्राउंडेड' होने का मतलब है जमीन से जुड़ना, यानी अपने दिमाग को उन विचारों से बाहर निकालना जो भविष्य की चिंता या अतीत के पछतावे में भाग रहे हैं, और उसे 'वर्तमान पल' (Present Moment) में लाना। 'माइक्रो' शब्द दिखाता है कि इसके लिए आपको किसी शांत कमरे या चटाई की जरूरत नहीं है; आप इसे ऑफिस की डेस्क पर, मेट्रो में, या किचन में काम करते हुए भी सिर्फ 1 या 2 मिनट में कर सकते हैं।
'आचमन' या स्पर्श का विज्ञान (The Ritual of Water): जब पुराने समय में लोग बाहर से आते थे या तनाव में होते थे, तो सबसे पहले हाथ-मुंह धोते थे या थोड़ा पानी पीते थे।
2-मिनट का नियम: जब बहुत तनाव हो, तो वॉशरूम जाएं, ठंडे पानी से अपनी हथेलियों और आंखों को छुएं। सिर्फ 30 सेकंड के लिए पानी के ठंडे अहसास को महसूस करें। यह आपके नर्वस सिस्टम को तुरंत शांत करता है।
धरती का स्पर्श (The Concept of 'Prithvi' / Earthing): * 2-मिनट का नियम: यदि आप कुर्सी पर बैठे हैं, तो अपने दोनों पैरों को जमीन (फर्श) पर सीधा और फ्लैट रखें। अपनी आंखें बंद करें और महसूस करें कि जमीन आपका वजन संभाल रही है। 2 मिनट के लिए पूरा ध्यान पैरों के तलवों पर ले आएं। इसे विज्ञान में 'बिल्डिंग बेस' कहते हैं।
हथेली की गर्माहट ('करदर्शनम' का आधुनिक रूप): हमारी परंपरा में सुबह उठकर हथेलियां देखने और उन्हें चेहरे पर लगाने का महत्व है।
2-मिनट का नियम: अपनी दोनों हथेलियों को आपस में इतनी तेजी से रगड़ें कि वे गर्म हो जाएं। फिर उन गर्म हथेलियों को कप की तरह बनाकर अपनी बंद आंखों पर रखें। उस अंधेरे और गर्माहट को 1 मिनट के लिए महसूस करें। यह थकी हुई आंखों और दिमाग को तुरंत आराम देता है।
सांसों का नियम (The 4-7-8 Breath or Pranayama):
2-मिनट का नियम: केवल 3 बार गहरी सांस लें, जहां आपकी सांस छोड़ने का समय, सांस लेने के समय से दोगुना हो (जैसे 4 सेकंड सांस ली, 8 सेकंड में छोड़ी)। यह हमारी पुरानी प्राणायाम पद्धतियों का ही एक सहज रूप है।
यह व्यावहारिक (Practical) है: इसके लिए लाइफस्टाइल बदलने की जरूरत नहीं है। यह सिखाता है कि आप जैसी भी जिंदगी जी रहे हैं, उसी के बीच में शांति कैसे ढूंढें।
जब मामा के घर पहुंची तो विभा बाहर जाने की तैयारी में थी.
मैं विदेश लौटकर छोटा नागपुर के एक चन्द्रवंशीय राजा के दरबार में नौकरी करने लगा। उन्हीं दिनों मेरी देशव्यापी कीर्ति की पटल पर अचानक एक छोटी-सी कहानी खिल उठी। उन दिनों गगन टेसू की रक्तिमाभा से विभोर था। शाल वृक्ष की टहनियों पर मंजरियां झूल रही थीं। मधुमक्खियों के समूह मंडराते फिर रहे थे। व्यापारी लोगों का लाख संग्रह का समय आ गया था। बेर और शहतूत के पत्तों से रेशम के कीड़े इकट्ठे किए जा रहे थे। संथाल जाति महुए बीनती हुई फिर रही थी। नूपुर की झंकार के समान गूंजती हुई नदी वहीं पर बही जा रही थी। मैंने स्नेह से उस नदी का नाम रखा था- 'तनिका'।
उस समय का वातावरण अनोखे आवेश से परिपूर्ण था। उसका मेरे मन पर भी अधिकार हो गया था। जिससे कार्य की गति मंथर पड़ गई थी। तब मैं अपने पर ही खीझ उठा था।कुछ दिनों से गांव में हर रविवार के दिन एक सत्संग मंडली आना शुरू हो गई थी. मंडली में कुलमिला कर 3 लोग थे, एक मंडली के प्रमुख गुरु बाबा और बाकी 2 बूढ़ी बाईजी. गुरु बाबा की उम्र 45 साल के आसपास थी, लेकिन तंदुरुस्ती उन्हें जवान दिखाती थी. शुरुआत में गांव में केवल मीना का ही एक घर था, जिस में गुरु बाबा सत्संग करने आते थे, लेकिन कुछ ही दिनों में आधे गांव की औरतें गुरु बाबा की भक्त हो गईं. गुरु बाबा इन दिनों शहर के किसी मंदिर में रहते थे और रविवार का दिन आते ही इस गांव में मीना के घर सत्संग करने आ पहुंचते थे.
शामनाथ और उनकी धर्मपत्नी को पसीना पोंछने की फुर्सत न थी। पत्नी ड्रेसिंग गाउन पहने, उलझे हुए बालों का जूडा बनाए मुँह पर फैली हुई सुर्खी और पाउडर को मले और मिस्टर शामनाथ सिगरेट पर सिगरेट फूंकते हुए चीजों की फेहरिस्त हाथ में थामे , एक कमरे से दूसरे कमरे में आ – जा रहे थे।
आखिर पांच बजते-बजते तैयारी मुकम्मल होने लगी। कुर्सियां, मेज, तिपाइयां, नैपकिन, फूल, सब बरामदे में पहुंच गए। ड्रिंक का इन्तजाम बैठक में कर दिया गया। अब घर का फालतू सामान अलमारियों के पीछे और पलंगों के नीचे छिपाया जाने लगा। तभी शामनाथ के सामने सहसा एक अडचन खडी हो गई, मां का क्या होगा?सिद्धेश्वरीजी बड़बड़ाए जा रही थीं. जितनी तेजी से वे माथे पर हाथ फेर रही थीं उतनी ही तेजी से जबान भी चला रही थीं.