अपने ही बुने जालों में फंसा मन
जाने कब शांति को कहाँ दूर छोड़ आया?
"कुछ" और पाने की चाह में
मिले को भी गंवाता जाता
पर ये "कुछ" और परिभाषित क्यों नहीं हो पाता ?
कहाँ जाकर रुकेगी
अनजान राहों पर चलने की मन की फिसलन ?
राकेश
अपने ही बुने जालों में फंसा मन
जाने कब शांति को कहाँ दूर छोड़ आया?
"कुछ" और पाने की चाह में
मिले को भी गंवाता जाता
पर ये "कुछ" और परिभाषित क्यों नहीं हो पाता ?
कहाँ जाकर रुकेगी
अनजान राहों पर चलने की मन की फिसलन ?
राकेश
सच कुछ भी हो
[ सोलह दिसंबर 2012 की काली रात के बाद लिखी ये कविता निर्भया को समर्पित]
मेरी कमीज़ की आस्तीन पर... कई दाग हैं.... ग्रीस और आइल के
बात शायद अजीब सी है ....
कोई विकल्प " न " चुनना
चुप रहना या बुदबुदाना .....अस्पष्ट शब्दों को
मैं... और
वक्त
तर्क से सिद्ध किया जा सकता है
तपना जरूरी है
पकने के लिए ...
Sometimes in the dark of the night,
जीवन में किसी को ‘हाँ’ कहने से
शहर की बड़ी सब्जी मंडी में
एक किनारे टाट का बोरा बिछाकरइक दौर था वो भी...
हर घर के किसी एक ही कमरे में पड़ाकई लोग... कितना होना है.... कितना नहीं.... के बीच फंसे हैं
यह कविता 'मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा' हिंदी साहित्य की एक बहुत ही प्रसिद्ध और भावुक कविता है।
यहाँ इस कविता से जुड़ी जानकारी दी गई है:
मूल कवि: उदय भानु 'हंस' (Uday Bhanu Hans), जो हरियाणा के पहले राज कवि थे और अपनी रुबाइयों (चार-पंक्ति की कविताएँ) के लिए जाने जाते हैं।
प्रसिद्ध वाचक: अभिनेता आशुतोष राणा (Ashutosh Rana) ने अपने खास अंदाज़ और दमदार आवाज़ में इस कविता का पाठ किया है, जिसने इसे नई पीढ़ी के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया है।
यह कविता एकतरफ़ा, पूर्ण और निःस्वार्थ प्रेम की अभिव्यक्ति है। कवि अपने महबूब से कहता है कि मैंने तो आपसे प्रेम कर लिया है, अब आप इसे चाहे जो नाम दें:
समर्पण का भाव: कवि कहता है कि अब आप मेरे इस प्रेम को चाहे चंचलता कह लें, या दुर्बलता कह लें, लेकिन दिल के मजबूर करने पर मैंने तो आपसे प्रेम कर लिया है।
प्रेम की गहराई: कवि कहता है कि यह प्रेम दिए का तेल नहीं है जो दो-चार घड़ी में ख़त्म हो जाए, बल्कि यह तो कृपाण (तलवार) की धारा पर चलने जैसा है, यानी मुश्किलों से भरा हुआ है।
अखंड प्रेम: वह खुद को चातक (जो केवल वर्षाजल पीता है) और महबूब को बादल बताता है, खुद को आँसू और महबूब को आँचल बताता है। वह कहता है कि मैंने जो भी रेखा खींची, उसमें आपकी ही तस्वीर बना बैठा।
परिचय: वह कहता है कि जब भी किसी ने मेरा परिचय पूछा, मैंने आपका नाम बता बैठा।
अंतिम गंतव्य: चाहे मैं जीवन के जिस भी रास्ते पर चल निकला, अंत में आपके ही दर पर जा बैठा।
यह कविता प्रेम में दीवानगी, संपूर्ण समर्पण और महबूब के प्रति अटूट विश्वास की एक सुंदर मिसाल है।