"दो घड़ी वो पास जो बैठे" (Do Ghadi Woh Paas Jo Baithe) भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्ण युग (Golden Era) का एक अनमोल हीरा है। फिल्म 'गेटवे ऑफ इंडिया' (1957) का यह गाना आज भी पुराने गानों के शौकीनों की पहली पसंद है।
यहाँ इस क्लासिक गीत की पूरी जानकारी दी गई है:
गीत का विवरण
गायक: मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर
संगीतकार: मदन मोहन (Madan Mohan)
गीतकार: राजिंदर कृष्ण
फिल्म: गेटवे ऑफ इंडिया (1957)
कलाकार: भारत भूषण और मधुबाला
इस गीत की खास बातें
मदन मोहन का संगीत: मदन मोहन साहब को "गज़लों का राजा" कहा जाता था। इस गाने में उन्होंने जो कोमलता और धुन पिरोई है, वह सीधे रूह में उतर जाती है।
मधुबाला की खूबसूरती: इस गाने में मधुबाला की सादगी और भारत भूषण के साथ उनकी केमिस्ट्री देखने लायक है। पुराने ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा का यह जादू आज भी बरकरार है।
रफ़ी और लता की जुगलबंदी: इन दोनों महान गायकों ने जिस नज़ाकत से इस गाने को निभाया है, वह बेमिसाल है। गाने के अंत में रफ़ी साहब का अलाप और लता जी की सुरीली आवाज़ इसे एक मुकम्मल अनुभव बनाती है।
गीत के बोल (मुख्य अंश)
"दो घड़ी वो पास जो बैठे, तो हम कुछ कह सके पर वो कमबख्त घड़ी, ऐसी चली के क्या कहें..."
गीत का भाव
यह गाना उस अधूरेपन और बेताबी को दिखाता है जब प्रेमी को अपने साथी के साथ कुछ पल बिताने का मौका तो मिलता है, लेकिन समय इतनी जल्दी बीत जाता है कि दिल की बातें दिल में ही रह जाती हैं।
Beautiful song Reena g
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