Friday, April 13, 2012

इतने ऊँचे उठो


इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥

नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥

लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धन, रुके न चिंतन
गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।

चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है!

(द्वारिका प्रसाद महेश्वरी )

Wednesday, April 11, 2012

इस बार नहीं.........

(Mumbai Hadse per  likhi gayi  PRASOON JOSHI ki ek Kavita)

इस बार नहीं
इस बार जब वोह छोटी सी बच्ची मेरे पास अपनी खरोंच ले कर आएगी
मैं उसे फू फू कर नहीं बहलाऊँगा
पनपने दूँगा उसकी टीस को
इस बार नहीं
इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखा देखूँगा
नहीं गाऊँगा गीत पीड़ा भुला देने वाले
दर्द को रिसने दूँगा,उतरने दूँगा अन्दर गहरे
इस बार नहीं .........


इस बार मैं न मरहम लगाऊँगा
न ही उठाऊँगा रुई के फाहे
और न ही कहूँगा कि तुम आंखें बंद करलो, गर्दन उधर कर लो मैं दवा लगाता हूँ
देखने दूँगा सबको हम सबको खुले नंगे घाव
इस बार नहीं......


 इस बार जब उलझने देखूँगा, छटपटाहट देखूँगा
नहीं दौडूंगा उलझी डोर लपेटने,  उलझने दूँगा जब तक उलझ सके
इस बार नहीं........


 इस बार कर्म का हवाला दे कर नहीं उठाऊँगा औजार
नहीं करूंगा फिर से एक नयी शुरुआत, नहीं बनूँगा मिसाल एक कर्मयोगी की
नहीं आने दूँगा ज़िन्दगी को आसानी से पटरी पर
उतरने दूँगा उसे कीचड मैं, टेढे मेढे रास्तों पे
नहीं सूखने दूँगा दीवारों पर लगा खून
हल्का नहीं पड़ने दूँगा उसका रंग
इस बार नहीं बनने दूँगा उसे इतना लाचार
कि पान की पीक और खून का फर्क ही ख़त्म हो जाए
इस बार नहीं.......


इस बार घावों को देखना है
गौर से थोड़ा लंबे वक्त तक
कुछ फैसले और उसके बाद हौसले
कहीं तो शुरुआत करनी ही होगी
इस बार यही तय किया है

Zindagi Zindagi Mere Ghar Aana | Anuradha Paudwal, Bhupinder Singh| Dooriyan Songs | Sharmila Tagore




Film 'Dooriyan' (1979) ka ye gaana "Zindagi Zindagi Mere Ghar Aana" ek bahut hi pyaara aur sukoon dene wala geet hai. Ye gaana rishton ki gehrai aur ghar ki khushi ko bahut hi khoobsurti se bayaan karta hai.

Is gaane ki kuch khaas jankari niche di gayi hai:

Gaane ka Details:

  • Gaayak (Singers): Anuradha Paudwal aur Bhupinder Singh

  • Sangeetkar (Music Director): Jaidev

  • Geetkar (Lyrics): Gulzar

  • Film: Dooriyan (1979)

  • Cast: Sharmila Tagore aur Uttam Kumar


Is Gaane ki Visheshtayein:

  1. Gulzar ki Shayari: Gulzar sahab ne zindagi ko ek mehman ki tarah ghar aane ka nyota diya hai. Unke bol bahut hi gehre aur dil ko chhu lene wale hain.

  2. Jaidev ka Sangeet: Sangeetkar Jaidev ne is gaane mein ek bahut hi shaant aur madhur dhun di hai jo sunne wale ke mann ko shaanti deti hai.

  3. Anuradha Paudwal aur Bhupinder Singh: Anuradha Paudwal ki naram awaaz aur Bhupinder Singh ki bhari awaaz ka mel is gaane ko ek unique pehchan deta hai.

  4. Uttam Kumar aur Sharmila Tagore: Bengal ke mahanayak Uttam Kumar aur Sharmila Tagore ki jodi ne is gaane mein ek paripakv (mature) aur sundar rishte ko parde par utara hai.

Gaane ke Bol (Main Lines):

"Zindagi zindagi mere ghar aana, mere ghar aana Zindagi zindagi mere ghar aana, mere ghar aana Aana doston ki tarah, haath thame huye..."



(This video is posted by channel – {Goldmines Gaane Sune Ansune} on YouTube, and Raree India has no direct claims to this video. This video is added to this post for knowledge purposes only.)

Aap ki yaad aati rahi - Gaman.flv

SEENE MEIN JALAN AANKHON MEIN TOOFAN SA KYUN HAI - SURESH WADKAR


(This video is posted by channel – Saregama Ghazal on YouTube, and Raree India has no direct claims to this video. This video is added to this post for knowledge purposes only.)

 


Kabhi Kisi Ko Mukumal Jahan by Bhupinder Singh




भूपिंदर सिंह का गाया गीत "कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता" भारतीय सिनेमा के सबसे भावुक और दार्शनिक गीतों (philosophical songs) में से एक है।

यह गाना 1981 में आई फ़िल्म 'आहिस्ता आहिस्ता' (Ahista Ahista) का है।

यहाँ इस गीत और फ़िल्म से जुड़ी विस्तृत जानकारी और कुछ दिलचस्प तथ्य दिए गए हैं:

फ़िल्म और गीत का विवरण

विवरणजानकारी
फ़िल्म का नामआहिस्ता आहिस्ता (Ahista Ahista) (1981)
गायक (Male Version)भूपिंदर सिंह (Bhupinder Singh)
संगीतकारख़य्याम (Khayyam)
गीतकारनिदा फ़ाज़ली (Nida Fazli)
निर्देशकइस्माईल श्रॉफ (Esmayeel Shroff)
मुख्य कलाकारकुणाल कपूर, पद्मिनी कोल्हापुरे, नंदा, शम्मी कपूर
गीत का मूडउदास, दार्शनिक ग़ज़ल

गीत से जुड़े दिलचस्प तथ्य (Interesting Facts)

  1. ग़ज़ल का मास्टरपीस संयोजन: यह गीत भारतीय सिनेमा के तीन महान कलाकारों—गायकी में भूपिंदर सिंह, संगीत में ख़य्याम, और शायरी में निदा फ़ाज़ली—के बेहतरीन तालमेल का नतीजा है।

  2. दो संस्करण (Two Versions): इस गीत के दो क्लासिक संस्करण हैं:

    • पुरुष संस्करण (Male Version): जिसे भूपिंदर सिंह ने अपनी गहरी और मखमली आवाज़ में गाया है।

    • महिला संस्करण (Female Version): जिसे प्रसिद्ध गायिका आशा भोसले ने गाया है। दोनों ही संस्करण बहुत लोकप्रिय हुए थे।

  3. फ़िल्म का आधार (Source Material): फ़िल्म 'आहिस्ता आहिस्ता' 1967 की कन्नड़ फ़िल्म 'गेज्जे पूजे' (Gejje Pooje) की रीमेक थी।

  4. निदा फ़ाज़ली की शायरी: यह ग़ज़ल मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली ने लिखी थी, और यह उनके सबसे प्रसिद्ध फिल्मी गीतों में से एक है। ग़ज़ल जीवन की कड़वी सच्चाई को बयां करती है कि किसी को भी कभी मुकम्मल (संपूर्ण) जहाँ (दुनिया/खुशी) नहीं मिलती। यह निराशा और उम्मीद के मिश्रण को खूबसूरती से दर्शाती है।

  5. ख़य्याम का संगीत: ख़य्याम साहब को उनके भावपूर्ण और ग़ज़ल-आधारित संगीत के लिए जाना जाता है। उन्होंने इस गीत को एक ऐसी धीमी और मार्मिक धुन दी जो भूपिंदर सिंह की आवाज़ की गहराई के साथ पूरी तरह से मेल खाती है।

  6. कलाकार: इस फ़िल्म में कुणाल कपूर (शशि कपूर के बेटे) और पद्मिनी कोल्हापुरे मुख्य भूमिकाओं में थे।

यह गीत आज भी उन लोगों के बीच एक कालातीत (timeless) क्लासिक बना हुआ है जो शायरी और भावपूर्ण संगीत पसंद करते हैं।

(This video is posted by the channel Goldmines Gaane Sune Ansune on YouTube, and Raree India has no direct claim to this video.) This video is added to this post for knowledge purposes only.)

ye kya jageh hai film umrao jaan




ग़ज़ल का विवरण: "ये क्या जगह है दोस्तों"

यह गीत उमराव जान के जीवन के अकेलेपन, पहचान के संकट (Identity Crisis) और उदासी को दर्शाता है।

विशेषताजानकारी
फ़िल्मउमराव जान (Umrao Jaan) (1981)
गायकआशा भोंसले (Asha Bhosle)
संगीतकारख़य्याम (Khayyam)
गीतकारशहरयार (Shahryar)
कलाकाररेखा (Umrao Jaan)

वीडियो का सार और मूड

  • थीम: यह गीत तब आता है जब उमराव जान (रेखा) को अपने गृहनगर फ़ैज़ाबाद के क़रीब किसी पड़ाव पर रुकना पड़ता है। यहाँ, वह अपने पुराने जीवन और नए जीवन के बीच के विरोधाभास को महसूस करती है।

  • भावनात्मक गहराई: यह गीत पूरी तरह से नायिका की आंतरिक पीड़ा (internal pain) को व्यक्त करता है। वह अपनी क़िस्मत और जीवन से पूछती है कि वह उसे कहाँ ले आया है, जहाँ चारों तरफ सिर्फ़ धूल और उदासी (ग़ुबार ही ग़ुबार) है।

  • मुख्य पंक्तियाँ:

    ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है

    हद-ए-निगाह तक जहाँ, ग़ुबार ही ग़ुबार है

    ये किस मक़ाम पर हयात, मुझको लेके आ गयी

    ना बस ख़ुशी पे जहाँ, ना ग़म पे इख़्तियार है

    यह पंक्तियाँ बताती हैं कि जीवन उसे ऐसी जगह ले आया है, जहाँ उसे न तो ख़ुशी पर नियंत्रण है और न ही वह अपने ग़मों को नियंत्रित कर सकती है।


फ़िल्म 'उमराव जान' (1981) के बारे में दिलचस्प तथ्य

  1. क्लासिक उपन्यास पर आधारित: यह फ़िल्म मिर्ज़ा हादी रुसवा के 1905 के उर्दू उपन्यास 'उमराव जान अदा' पर आधारित है, जिसे उर्दू साहित्य के महान उपन्यासों में गिना जाता है।

  2. रेखा का करियर का शिखर: अभिनेत्री रेखा ने अपने उमराव जान के किरदार के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (National Film Award) जीता, जिसे उनके करियर की सबसे शानदार प्रस्तुतियों में से एक माना जाता है।

  3. संगीत की सफलता: फ़िल्म का संगीत हिंदी सिनेमा के सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ (Best of all time) साउंडट्रैक में से एक है। ख़य्याम को इस संगीत के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

  4. आशा भोंसले का सम्मान: इस फ़िल्म के गीतों (ख़ासकर "दिल चीज़ क्या है") के लिए आशा भोंसले को भी राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, जो उनके करियर का एक महत्वपूर्ण पल था।

  5. निर्देशन और कला: निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली (जो एक चित्रकार भी हैं) ने 19वीं सदी के लखनऊ की नवाबी तहज़ीब और वास्तुकला को पर्दे पर जीवंत कर दिया। फ़िल्म ने सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन (Best Art Direction) का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।

  6. पहले विकल्प नहीं थे संगीतकार: दिलचस्प बात यह है कि ख़य्याम, मुज़फ़्फ़र अली की संगीतकार के तौर पर पहली पसंद नहीं थे। उन्होंने पहले जयदेव और फिर नौशाद से संपर्क किया था, लेकिन अंततः यह काम ख़य्याम ने किया और इतिहास रच दिया।

(This video is posted by channel – TheDeepGold on YouTube, and Raree India has no direct claims to this video. This video is added to this post for knowledge purposes only.)

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