Monday, October 22, 2012

उपलब्धियाँ



















अमेरिका के न्यू जर्सी राज्य के इस मृत्यु-गृह में बैठा मैं अपने मन को सामने रखे शव से दूर ले जाने की चेष्टा कर रहा हूँ। सामने ब्रिगेडियर बहल का मृत शरीर पड़ा है। कल ही तो उनकी मृत्यु हुई है।
कोफ़िन यानी शव-पेटी के सामने खड़े पंडित जी और उनकी ओर मुख़ातिब कोई एक दर्जन संबंधी-गण पंडितजी पंजाबी-मिश्रित हिन्दी-अंग्रेज़ी में कुछ-कुछ बुदबुदाते हैं, "नैनम्‍ छिन्दति शस्त्राणि नैनम्‍ दहति पावकः" जैसी को चीज़। उपस्थितों में कोई भी उनकी बात नहीं समझ रहा है, पर सब लोग समझने का बहाना सा बना रहे हैं। उनके पुत्र-पुत्रवधू के मुख पर बेचैनी ज़्यादा, शोक कम है। करीब-करीब वैसे ही भाव सबों के चेहरे पर हैं, पत्नी, बेटी-दामाद, सबके चेहरे पर। एक मित्र और उनकी पत्नी ज़रूर ही शोक-मग्न लग रही हैं। मैं इन लोगों को नहीं जानता। पर ब्रिगेडियर साहब को तो बहुत दिनों से जानता हूँ।
पंडित जी व्याख्यान दे रहे हैं: "ईश्वर को याद कीजिये, वही सब करता है, ईश्वर मीन्स गौड, जी ओ डी, गौड, गौड, जी से जेनेरेटर, याने बनाने वाला, ओ से ओपरेटर याने चलाने वाला और डी से डिस्ट्रायर, याने संहार करने वाला, इसीलिये तो उसे अंग्रेज़ी में गौड कहते हैं। अरे, इन अंग्रेज़ों ने हमारे धरम से ही तो लिया है यह गौड का कान्सेप्ट। यही गौड हमारा ब्रह्मा, याने बनाने वाला, विष्णु, याने चलाने वाला और शिव याने संहार करने वाला है।"
मैं पंडित जी के इस भौंडे व्याख्यान को सुन-सुन कर ऊब चुका हूँ। अब गुस्सा भी आ रहा है। मेरा मन इन्हीं ख़्यालों में डूबता-उतरता २६ साल पहले के ब्रिगेडियर बहल में उलझ जाता है।
तब वे कर्नल बने ही थे। मेरे बटालियन कमांडर बन कर आये थे। छः फुट लम्बा कसरती बदन, यही ४० के आस-पास रहे होंगे। गर्वीले चेहरे पर नुकीली मूँछें, १९७१ की लड़ाई में उन्हें अदम्य साहस के लिए वीर-चक्र मिला था। मुझे याद है कि जब उनकी पोस्टिंग हो कर आई थी तो मैं अभी-अभी कप्तान बना था। उनके वीर-चक्र के तमगे के कार्ण मेरे मन में उनके प्रती इज़्ज़त तो पहले से ही काफी थी, उनसे मिलकर वह और दुगुनी हो गई। आते ही दूसरे ही दिन अफ़सर मेस में उन्होंने मुझसे पूछा था, "सुना है पंडित तुम कम्पनी के साथ दौड़ते हो?"
मैंने कुछ घबराते हुए, कुछ गर्व से कहा था, "हाँ सर।"
मैं पल्टन का "पंडित" था; मैं, याने कैप्टेन नवल किशोर पाण्डेय। मुझे सभी फौजी साथी पंडित या किशोर कहकर बुलाते थे।
चीकू, सर, याने मेजर चोकालिंगम, हमारे एडजुटेन्ट थे। उन्होंने ठहाका लगाया, "सर, यह पंडित दौड़ता ही नहीं, सबसे तेज़ दौड़ता है।" मैं सोच रहा था, इस चीकू के बच्चे को आज फिर चढ़ गई है। वैसे तो यह हमेशा पिये रहता है, आज लगता है इसे कुछ ज़्यादा ही चढ़ी है।
"अच्छा तो बच्चू, कल हो जाय हमारी तुम्हारी दौड़।" कर्नल बहल ने कहा था। मैं मन ही मन तेज़ी को कोस रहा था, कहाँ फँसा दिया इस चीकू के बच्चे ने मुझे?
मैंने झेंपते हुए कहा था, "सर ऐसा कुछ नहीं है, ये चीकू सर ऐसे ही कहते हैं। मैं तेज़-वेज़ नहीं दौड़ता, पर आप कहते हैं तो सुबह लेफ़्टिनेन्ट वर्मा को कम्पनी के साथ भेजकर आपके साथ दौड़ने चलूँगा।"
और सुबह की दौड़... बहल साहब उस दिन खूब दौड़े। फौज में ३५ की उम्र के बाद ८ मील दौड़ना पड़ता है, बाकी दस मील। कालूचक–जम्मू सड़क पर चार मील दौड़ने के बाद उन्होंने कहा था, "मुझे भी तू दस मील दौड़ायेगा क्या?"
मैंने कहा, "सर चाहें तो चलते हैं, नहीं तो यहीं से लौट चलें।"
"अरे नहीं यार, आगे चलेंगे।" और हम दौड़ते रहे।
जब अफ़सर मेस में लौटे तो हाँफते–हाँफते उन्होंने चीकू को बुलाया था, "एडजुटेन्ट साहेब, यार इस पंडित में तो बहुत दम है, पर मैं भी कोई कम नहीं हूँ"। फिर मेस–हवलदार रामास्वामी पर चिल्लाते हुये बोले, "अरे ओ रामास्वामी, आज से सारे बचे–खुचे अंडे इस पंडित को खिला दिया कर, नहीं तो एक दिन हम तेरे कप्तान साहब को दौड़ में पछाड़ देंगे।"
रामास्वामी और चीकू हँसते रहे और हमारी दौड़ की थकान धीरे–धीरे ठहाकों में डूब गई। तब से हम जूनियर सीनियर अफसर कम थे, दोस्त ज़्यादा।
इसलिये जब मिसेज बहल पलटन में आई तो मैं उनके परिवार का एक सदस्य बन कर रह गया था। दो बेटियाँ और बेटा संजय, सबसे छोटा। बड़ी बेटी की शादी उसी साल दिल्ली करके आयी थी मिसेज बहल। दूसरी बेटी, अठारह वर्षीय सोनम, साथ लाईं थीं। संजय कोई दस–बारह का रहा होगा।
याद नहीं आ रहा है कि यह सोनम की युवा उम्र का आकर्षण था या कर्नल बहल की अक्खड़ आत्मीयता, जो मुझे उनके पास ज़्यादा खींचती गई। धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व के कई पहलू सामने आये... एकदम निर्भय... अल्हड़ व्यक्तित्व। डेरा बाबा–गाज़ी खाँ में जन्मे, १९४७ में सब कुछ लुटाकर दिल्ली की सड़कों पर शरणार्थी बने इस युवक में भारत के प्रति अगाढ़ निष्ठा स्वाभाविक थी, अपने देश पर गर्व स्वाभाविक था। उनकी इस अलहड़ निर्भयता तथा वीरोचित कृत्यों का दर्शन भारत की जनता को १९७१ की लड़ाई में हुआ था।
मेरी पलटन में, कर्नल साहब अफ़सरों के बीच अपनी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा तथा अनुशासन के लिये प्रसिद्ध थे। जवानों के प्रति उनकी सहानुभूति देखने लायक थी। जाने कितने जवानों को उन्होंने अपनी तनख़ाह से पैसे निकालकर उनके बच्चों की शादी, खिलौने आदि के लिये दिये होंगे। ब्रिगेडियर बनने वाली ट्रेनिंग, एच सी कोर्स, यानि हायर कमान्डर कोर्स के लिये जाते वक्त उनके इन गुणों के कारण लोगों का प्यार जैसे उमड़ पड़ा था। स्टेशन पर उन्हें बिदाई की सलामी देने हमारी अपनी पलटन के हज़ार लोग ही नहीं, बल्कि दूसरी कई पलटनों के अफसर तथा जवान भी उपस्थित हुये थे। विदाई में सलामी में एटेन्शन की मुद्रा में खड़ी वह हज़ारों की भीड़... ।
और आज इस अन्तिम विदाई में... जम्मू–कालूचक से बहुत दूर... इस अनजान जगह में, मुठ्ठी भर, बस एक दर्जन लोग...।
उस दिन जो हमारे रास्ते अलग हुये वे एक दिन फिर अमेरिका आकर मिले। उनके एक भाई अमेरिका में थे, जिन्होंने बहल साहब को बुलाया। सोनम की शादी एक फौजी अफसर के साथ करके, उसका परिवार बसा के, यहाँ आ गये थे, अमेरिका में, संजय का भविष्य बनाने।
आने के तीन चार महीने बाद ही उन्हें मेरे बारे में पता चला तो अचानक मुझे फोन किया। वही अक्खड़पन, वही उन्मुक्त आत्मीयता... उनके दिल की गर्मी को, दूरी के बावजूद भी मैं अपने पोर–पोर में महसूस कर रहा था। मैं तो गदगद था, वे भी बड़े खुश लग रहे थे। इतने दिनों की बिछड़ी यादों को ताज़ा करते, मेरी, अपनी, पोस्टिंग को पूछते बताते, उन्होंने घंटों फोन पर बात की।
कहते रहे, "यार पंडित, अब तो मैं यहाँ आ ही गया... चाहता हूँ किसी तरह संजय का जीवन बन जाय तो मुझे फुर्सत हो जाय। वहाँ दिल्ली में बड़े अच्छे कालेज से बी ए किया पर नौकरी के कोई आसार नहीं थे, फौज में यह जाना नहीं चाहता था। अतः यही एक रास्ता दिखा। शायद यहाँ सेटल होने का चान्स मिल जाय।"
मैंने पूछा था, "वह तो ठीक हैं संजय की पढ़ाई के लिये कुछ न कुछ तो पैसे चाहिये ही होंगे? आप क्या कोई नौकरी करोगे या कर रहे हो?"
वे हँसते हुये, मेरे बिहारीपने को याद दिलाते हुये, बोले "तेरी पुरानी आदत गई नहीं है बबुआ, अब भी दूसरों की फिकर नहीं जाती। इतना सोच रहा है मेरे बारे में, क्या कोई नौकरी दिलवायेगा?
मैंने तो अपनी नौकरी ढूँढ़ ली है। कब तक बैठा रहता, महीनों निठल्ला था, पर मन नहीं लगा और पैसों की भी ज़रूरत महसूस होने लगी थी। बाकी कुछ तो इस उमर में मिला नहीं, एक टेक्नीशियन की नौकरी कर ली है।"
उनके मन का दर्द उनकी आवाज़ में अब झलकने लगा था। मेरे मन में भी एक टीस सी उठी थी, मैं मन ही मन सोच रहा था इंजीनियरिंग कालेज का टापर, कोर ऑफ इंजीनियर्स का ब्रिगेडियर, किस तरह अपने गरूर को ताक पर रख कर टेक्नीशियन की नौकरी करता होगा।
वे शायद मेरी चुप्पी के चलते मेरे मन का दर्द भाँप गये थे, बोलते गये "बड़ी कोशिश की, इस उमर में कोई नई चीज़ पढ़ भी नहीं सकता और यहाँ इस देश की डिग्री के बिना कोई इज़्ज़त की नौकरी भी नहीं मिलती। खैर संजय अच्छा कर रहा है, यही मेरी उपलब्धि है।"
आज उस फोन–कॉल को कोई दस वर्ष बीत गये हैं। बहल साहब की बात ठीक निकली। जो संजय वहाँ बी. ए. करके साल भर निठल्ला बैठा था, वही दो साल में एम.बी.ए. करके एक छोटी कम्पनी में बड़ी अच्छी नौकरी में लग गया है। पिछले वर्ष वह वाइस–प्रेसिडेन्ट भी बन गया है। कम्पनी बढ़ती गई, वह भी बढ़ता गया। अब उसके उपर बड़ी ज़िम्मेदारियाँ हैं। हफ्तों बिज़नेस के कारण दौरों पर रहना पड़ता है। शादी भी हो गई।
शादी कराकर जब बहल साहब भारत से लौटे थे तो मेरे घर आये थे। बातचीत में कुछ पुरानी यादें फिर लौट आईं, और उन्हें अपने पुराना गाँव का मदरसा याद आने लगा था।
जीवन की मजबूर घड़ियों में हम सब यादों का दामन थाम कर पता नहीं क्यों अतीत की गोद में छुप जाना चाहते है... शायद इसलिये कि उस गोद में... केवल उसी गोद में... हमें अपनापन मिलता है, बाकी सब दुनिया तो औरों की है न। वर्तमान जीवन के थपेड़े देता है, और भविष्य अगली पीढ़ी के लिये सुरक्षित है। केवल अतीत ही अपना है। अतीत की यादें आम आदमी को जीवन के दर्शन की ओर उड़ा ले जाती हैं। बहल साहब, प्रसिद्ध कवि जौक की पंक्तियाँ, जो कभी बचपन में मदरसे में सुनी थी, गुनने–गुनगुनाने लगे थे-
लाई हयात आये, कज़ा ले चली, चले।
अपनी ख़ुशी न आये, न अपनी ख़ुशी चले।
बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे।
पर क्या करें जो काम ना बे दिल लगी चले?
दुनिया में किसने राहे फ़ना में दिया है साथ?
तुम भी चले चलो यूँ ही, जब तक चली चले।

संजय ने कल सुबह ही फोन किया था, "कैप्टेन किशोर, मेरे डैडी नहीं रहे। ही पास्ड अवे लास्ट नाइट।"
मुझे एक धक्का सा लगा था।
मैंने पूछा था, "कैसे? क्यों, क्या हुआ था? पिछले वीक–एन्ड को अस्पताल में उनसे मिलने गये थे तब तो वे एकदम ठीक लग रहे थे, घर जाने वाले थे।"
"हाँ, वे तो घर आ भी गये थे, ठीक–ठाक ही थे। इधर परसों थोड़ी तबीयत खराब हुई, मैंने कहा कि चलिये अस्पताल। पर पता नहीं क्यों जाने से मना कर दिया। माँ ने भी कहा, पर अपनी ज़िद पर अड़े रहे। वहाँ नहीं जाना मुझे, वहाँ जाकर क्या करूँगा, कितनी बार तो हो आया हूँ। मुझे मालूम है मुझे क्या बीमारी है.। वहाँ जाने पर ये सारे डाक्टर मेरा बदन काट–कूट कर मुझे जिलाने की कोशिश करेंगे। क्या करूँगा ऐसे जीकर मैं?' आदि आदि बोलते रहे, "आप तो जानते ही हैं, डैडी बड़े ज़िद्दी थे।"
"हाँ, जानता हूँ, मैंने मन ही मन सोचा था। जीवन भर आत्म–निर्भर रहने वाले इस आदमी को जीवन की सारी उपलब्धियों के बावजूद, दूसरों पर बोझ बन कर रहना अपनी अस्मिता के ख़िलाफ़ लग रहा था। वे किसी पर निर्भर रहकर जीना नहीं चाहते थे। सब कुछ तो उपलब्ध हो ही गया था उन्हें।
पिछले शनिवार को जब मिलने गया था अस्पताल में तो कहने लगे थे, "यार, अब सब कुछ तो हो ही गया है, बच्चे सब सेटल हो गये। सबका अपना अपना परिवार है, नौकरियाँ हैं। सब अपने में व्यस्त हैं। यही मेरी उपलब्धियाँ हैं। और क्या चाहिये? अब तो भगवान जितनी जल्दी अपने यहाँ बुला ले उतना अच्छा है... नहीं तो मारा–मारा फिरूँगा, बच्चों पर बोझ बन कर।"... इन बातों के पीछे छिपा यथार्थ, उनकी मौत की ख़बर सुनने के बाद मेरे सामने जैसे साक्षात खड़ा हो गया था।
अपने को संयत करते हुये, मैं संजय से पूछता हूँ, "माँ कैसी है?"
"माँ तो कुछ बोलती ही नहीं।"
"अच्छा मैं अभी आता हूँ।"
संजय के स्वर में बड़ी घबराहट थी, अनुनय था... "किशोर जी, मुझे इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है, क्या-क्या करना होगा, डेड–बौडी के साथ। और मुझे परसों ही मैक्सिको जाना है, दो मिलियन के कान्ट्रेक्ट का सवाल है, मैंने ही निगोशियेट किया है।"
डेड–बौडी वाली बात पर एक वितृष्णा सी होती है मन में। एक कसैलापन, एक आक्रोश, पता नहीं किस पर, पता नहीं क्यों?
मैं दो चार लोगों को फोन कर पंडित जी का पता लगाता हूँ। यहाँ पंडित बड़ी कठिनाई से मिलते हैं। वह भी श्राद्ध कराने के लिये। हिन्दुत्व के कर्म–काण्ड भी तो उलझे हुये हैं, तमिल पंडित, पंजाबी हिन्दू का दाह–संस्कार करने के लिये जल्दी तैयार नहीं होता। परिवार को भी लगता है, उनके प्रियजन की समुचित क्रिया नहीं हुई। जो पंडित जी मिले, उन्होंने कहा कि उन्हें पहले से ही चार जगहों पर जाना है। पर ग्यारह बजे वे कुछ समय निकाल पायेंगे। मैंने धन्यवाद दिया... इन्हीं खयालों में डूबा हूँ कि सामने हलचल होती है।
पंडित जी जोर-शोर से कुछ पढ़ रहे हैं... नैनम छिन्दन्ति शस्त्राणि। वहीं घिसा–पिटा श्लोक। अब शव–पेटी बन्द की जा रही है। मैं झटक कर बहल साहब को एक अन्तिम प्रणाम करता हूँ... उनकी उजली मूँछें वैसी ही दीख रही हैं तनी हुई... चेहरे पर लगता है एक गौरवमय शान्ति... शव–पेटी बन्द हो गई है। उसे दो अमेरिकन ले जा रहे हैं बगल के कमरे में जहाँ भट्टी है, जलाने वाली।
दोनों आपस में बातें कर रहे हैं... 'पहले सिर वाला हिस्से आगे करो, सिर जलने में ज़्यादा वक्त लगता है" मुझे "सत्य हरिश्चन्द्र" नाटक के जल्लाद याद आते हैं। मिसेज बहल रो रही है... मेरी ओर मुख़ातिब होकर कहती है... । 'सिर तो उत्तर की तरफ होना चाहिये न?'... अब तक मैं संयत था, पर मिसेज बहल का यह वाक्य मुझे भी रुला जाता है... मैं चुपचाप सिसकता खड़ा हूँ... पर सब जल्दी में हैं, जल्लाद, बेटा, सब। दुनिया का क्रम एक क्षण थम नहीं सकता।
संजय का प्लेन दो बजे है, वह जल्दी में हैं। बीबी पर सब छोड़ वह चला गया है। बाकी सब जाने को तैयार बैठे हैं। मैं भी चलूँ। मैंने भी तो आधे दिन ही ऑफ लिया था न।
पतझड़ के इस मौसम में हवा कभी मन्द, कभी ज़ोरों से चल रही है। लाल–पीले सूखे पत्ते हर जगह उड़ रहे हैं। मेरी कार मेरे ऑफिस की ओर जा रही है, मैं अनमना, पता नहीं क्या सोच रहा हूँ, जीवन... बहल साहब का, अपना... और इस जीवन की उपलब्धियाँ, आदि–आदि। हवा साँय–साँय कर रही है, मुझे बहल साहब द्वारा सुनाई गयी कवि जौक की आखिरी पंक्तियाँ याद आ रही हैं :
जाते हवाये–शौक में हैं, इस चमन से जौक,
अपनी बला से बादे–सबा अब कभी चले। 

(सुरेन्द्रनाथ तिवारी)

अपराध बोध


इस बात को काफी अरसा बीत गया है। शायद पैंतीस छतीस साल पहले की बात है। उस समय वे नौ या दस साल का रहा होगा। उसने एक चीनी कहानी पढ़ी थी। वह कहानी तो उसे पूरी तरह से याद नहीं पर इतना जरूर याद है कि कहानी में एक आदमी शहर से कहीं दूर एक ऐसी जगह फँस जाता है जहाँ दलदल और गंदे पानी तथा फिसलन भरे पत्थरों पर जमी काई और झाड़ियों के सिवा कुछ नहीं था। वो वहाँ से निकलना चाहता है पर निकल नहीं पाता। फिर एक दिन उसकी नज़र अचानक अपने हाथ पर जाती है। उसके हाथ पर काई उगने लगी थी। वो आदमी हाथ पर जम आई काई को नोच कर फेंकता है। लेकिन जितना ही वह आदमी काई को नोच कर फेंकने की कोशिश करता है, उतनी ही वे लिजलिजी काई उसके शरीर के दूसरे हिस्सों पर उगने लगती है। फिर काई के लच्छे उसके पूरे शरीर पर उग आते हैं। वह अपने आप से भागने लगता है। कहानी के अन्त में क्या हुया यह तो उसको भूल गया था पर वह कहानी कई दिनों तक उसके मानस पटल पर छाई रही थी। यहाँ तक की कई बार स्वप्न में वह उस आदमी की जगह अपने को देखता था और डर कर उठ जाता। तब वह उस कहानी का अर्थ पूरी तरह समझ नहीं पाया था।
आज वर्षों पश्चात उसे लगता है उस आदमी के हालात में और खुद उसकी

अंतहीन जीवन यात्रा


पैसों से भरा बैग उठाए बाऊजी आज क्या तनकर चल रहे हैं। मानो उम्र के बीस साल पीछे छोड़ आए हों। आखिर उनकी छाती चौड़ी क्यों नहीं होगी...? चारों बेटों की शादी करके घर में चार चार बहुएँ आ गई हैं। आज ही चौथी बहू दिव्या की डोली आई है। बहुत शानदार शादी हुई है दिल्ली के फाईव स्टार होटल में। भई यह शादी तो पूरे खानदान में एक मिसाल बन गई है। उस के ननिहाल ईरान में हैं। पिता का भी मद्रास में अच्छा ख़ासा व्यापार है उसी के अनुरूप दहेज भी बहुत ला रही थी। अब तो बाऊजी के पास भी बहुत पैसा है उनसे किसी बात में उन्नीस नहीं हैं। बहू के चढ़ावे में गहने भी देखने लायक थे। इसीलिए इस शादी पर बाकी  तीन बहुओं को भी भारी भारी सैट बनवा दिए गए थे। सजी धजी बीरो के भी खुशी के मारे ज़मीन पर पाँव नहीं टिक रहे हैं।

कभी वो भी दिन थे जवानी के......जब कपड़े के थान के गठ्ठर साईकिल पर रखकर धनपत घर घर जाकर कपड़ा बेचता था। बीरो से ब्याह करते ही

Sunday, October 21, 2012

फिर आना


















पतले शीशों की ऐनक में शाम का सूरज ढल रहा था। संध्या की लालिमा में घुल कर उसका साँवला चेहरा ताम्बई होने लगा। कस कर बनाए गए जूड़े से निकल कर बालों की एक लट हवा से शरारतें कर रही थी। अपनी देह पर घटते इन परिवर्तनों के प्रति निर्विकार-सी बनी वह पार्क की बेंच के सहारे मूर्तिवत टिकी हुई थी।
बरसों बाद की मुलाकात का कोई उछाह उसके चेहरे पर दर्ज नहीं हो पाया। आठ सालों बाद अचानक वह मुझे इस पार्क में मिली और पिछले चालीस मिनटों से हम साथ है। इस दौरान उसने मुझे सिर्फ पहचाना भर है। यह उसकी बहुत पुरानी आदत है, जान कर भी अनजान बने रहना।
'अब चलें?' उसके होठों से झरने वाली किसी शब्द की प्रतीक्षा में खुद को अधीर पाकर मैंने कहा। अपने से बातें करते रहने की उसकी यह अदा कभी मुझे बहुत रिझाती थी। आज सालों बाद यही अदा झेल पाना कितना मुश्किल लग रहा है।
'हूँ', चिहुँक कर उसने आँखें खोली-'तुमने कुछ कहा मनु?' आँखें बंद किए-किए वह जाने किन रास्तों पर निकल पड़ी थी। जी चाहा कि उससे पूछू कि इन अंधी यात्राओं से मैंने पहले भी कभी तुम्हें लौटा लाना चाहा था तब तुमने मेरी पुकार को क्यों अनसुना किया। मन हुआ कि उससे पिछले आठ सालों का हिसाब माँगू। पर मेरे मुँह से बस इतना ही निकला, 'अँधेरा घिरने लगा है, अभी कुछ देर और रूकोगी?'
'नहीं, अँधेरे में लौट पाना मुश्किल होगा।' उसने कहा और आँचल समेटते हुए उठ खड़ी हुई।
'मैं छोड़ दूँ?' साथ छूट जाने की कल्पना से डर कर मैंने पूछा, बिना यह जाने कि अभी तक उसने अपना पता-ठिकाना बताया ही कहाँ था। उसने एक पल सोचा, फिर सहमति में गर्दन हिलाती बोली- 'चलो, यहाँ से थोड़ा ही दूर है।'
'तुम रोज यहाँ आती हो?' दो कदमों के फासले से चलते हुए मैंने पूछा।
'हाँ, अक्सर', जवाब संक्षिप्त था।
'मैंने सोचा भी न था कि यहाँ तुमसे मुलाकात होगी', बात बढ़ाने की गरज से मैंने कहा- 'मैं ऑफिस से घर लौट रहा था कि कार खराब हो गई। यहाँ पार्क के पास एक गैराज है। मैकेनिक ने बताया कि गाड़ी ठीक होने में दो घंटे लगेंगे। वक्त काटने के लिए पार्क से अच्छी जगह और क्या हो सकती है?' कहते हुए मेरी आँखें अर्थपूर्ण हो उठीं।
'क्या कर रहे हो आजकल?' एकाएक बात बदलने की गरज से उसने निरी औपचारिकता से पूछा।
'तुम्हारा इंतजार', अचानक मेरे मुँह से निकल गया। अपनी रफ्तार में बढ़ते उसके कदम ठिठके और निगाहें मेरे चेहरे पर आ टिकी। उन आँखों में न कोई प्रश्र था और न कोई हैरानी। नजरों की उस ताब से घबरा कर बात सँभालते हुए मैंने कहा- 'मेरा मतलब है कई सालों से मैं अपनी नौकरी के सिलसिले में बाहर रहा। इस बीच तुम्हारी, सबकी याद भी आती रही। पिछले एक साल से इसी शहर में हूँ। एक मार्केटिंग कंपनी में सीनियर सैल्स मैनेजर।' एक साँस में अपनी बात खत्म करते हुए मैंने पूछा, 'और तुम?'
'शादीशुदा हूँ।' अपनी जगह से हिले बिना उसने जवाब दिया।
'अरे, उससे क्या फर्क पड़ता है, मर्द बच्चा हूँ, प्रेम में सब झेल जाऊँगा।' मैंने ठहाका लगाकर हँसने की कोशिश की।
'अच्छा! आओ, तुम्हें भी मिलवाऊँ।' उसने कहा। वह एक चौराहा था, जहाँ हम खड़े थे।
ठिठके कदम पास की पुरानी इमारत की बढ़ गए। मैं चुपचाप उसके पीछे हो लिया। लम्बी और घुमावदार बारहादरियों से होते हुए अब हम रुक गए थे। टूटे दरवाजे को एक ओर खिसका कर उसने भीतर जाने का रास्ता किया। हवा में फैली सीलन की गंध से घबरा कर मेरा रूमाल नाक पर आ गया था। उसका ख्याल आते ही मेरे मुँह से सफाई निकली, 'नमी की महक से मुझे एलर्जी है।'
'अच्छा, कब से?', मुझे लगा उसकी मुस्कान में कोई व्यंग्य छिपा हुआ है। मुझसे जवाब देते नहीं बना अलबत्ता मेरी नाक पर रखा रूमाल खुद-ब-खुद हट गया था। मीता को तो पता ही था कि सालों तक मेरी महत्वाकांक्षाएँ ऐसी ही एक अंधेरी और बदबूदार कोठरी में कैद थी। दूर के एक रिश्तेदार से विरासत में मिली दौलत ने मुझे इस कैद से निजात दिलवाते हुए मुझे रातों-रात लखपति बना दिया। पैसे के बल पर मेरी महत्वाकांक्षाएँ उड़ान भरने लगी। मीता के पिता भी शहर के रईसों में गिने जाते थे। मीता से बात करके हमेशा मुझे अच्छा लगता था।
'विभु, देखो तुमसे मिलने कौन आया है?', मीता ने पुकारा और जवाब में खाँसी की एक तेज लहर कमरे में गूँज उठी।
'आओ', उसने कहा और मैं यंत्रवत सा उसके पीछे चलने लगा। ईंटों के सहारे टिके पलंग पर लेटा वह शख्स बुरी तरह खाँस रहा था। तिपाई पर पड़े जग से मीता ने एक गिलास में पानी ढाला और उसके होठों से छुआ दिया। अपना काम खत्म करने के बाद वह मेरी ओर मुड़ी, 'तुम्हें भी तो प्यास लग आई होगी मनु?'
'मनु', मेरा नाम सुनकर करवट बदलता वह शख्स अब एकदम मेरे सामने हो गया था, 'यह तुम हो मनीष?'
चेहरा हालाँकि दाढ़ी-मूछों में घिर गया था लेकिन इस आवाज को मैं लाखों की भीड़ में भी पहचान सकता था। यह विभांशु था, कॉलेज का हमारा सहपाठी और मंच पर अपनी बुलंद आवाज से छा जाने वाला एक जबरदस्त कवि। मीता अक्सर उसकी कविताओं की तारीफें करती थी और मैं चिढ़ता रहा था तो उसकी फकीरी से।
'अच्छा हुआ तुम आ गए यार!' कहते हुए उसने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। उसका सुता हुआ चेहरा देखकर मेरी हिम्मत उसका हाथ थामने की नहीं हुई।
'अस्थमा छूत से नहीं फैलता!' मेरी ओर अपलक झाँकते हुए मीता ने सर्द लहजे में कहा। अपनी हड़बड़ाहट को छुपाने के प्रयास में मैंने एक बनावटी ठहाका लगाया और विभांशु का हाथ कस कर थाम लिया।
'मीता की बात पर मत जाना' मुस्कुराने की भरसक कोशिश करते हुए विभांशु ने कहा- वैसे भी एक बिगड़ा अस्थमा ही तो मुझे है नहीं, साथ में कई छोटी-मोटी बीमारियाँ भी बोनस में मिली हुई है।'
'तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे विभांशु!' सांत्वना के अंदाज में मैंने उसका हाथ थपथपाया।
'वह तो होना ही है', उसने कहा जैसे उसे किसी सांत्वना की आवश्यकता ही नहीं थी। 'डेढ़ साल से ही तो तो बिस्तर पर हूँ वरना तो अपना इंकलाब बुलंद ही था। मीता ही अब अपनी झंडाबरदार है।'
'खाट पकड़ कर बैठे हो पर कविताई गई नहीं तुम्हारी!' मीता ने एक मीठी झिडक़ी दी और रसोई की ओर बढ़ गई।
'कहो कहाँ रहे इतने साल?' विभांशु पूरी तसल्ली के साथ मुझसे मुखाबित हो गया। मैंने अपनी व्यस्तता से लेकर मीता से मुलाकात तक के सारे किस्से को चंद पंक्तियों में समेटने की कोशिश की। विभांशु जैसे मेरी बात खत्म होने के इंतजार में था - 'शादी बनाई?'
मेरा सिर इंकार में हिल गया और निगाहें रसोई की ओर। मीता का दिखना अब पूरी तरह बंद हो गया था।
'हाँ, मीता जैसी लड़की हो तभी शादी का कोई मतलब है?'  एकाएक कही गई उस बात ने मेरी चोर निगाहों को लौटने पर मजबूर कर दिया था। ऐसा क्या था उस फक्कड़ विभांशु में जिसके लिए मीता ने अपनी अमीरी और मेरे जज्बात को ठुकरा दिया।
'मैंने उसे अपने से जुड़ी हर बात बताई थी', विभांशु जैसे मेरा मन पढ़ रहा था। 'मीता से मैंने कहा था कि चंद कविताओं के अलावा मेरा कोई नहीं। माँ अपना अस्थमा मुझे सौंप कर मर चुकी थी। पिता ने अपना दूसरा परिवार बसाने की खुशी में अपने से दूर डेढ़ कमरों का यह घर तोहफे में दिया था। कॉलेज की पढ़ाई और पेट की लड़ाई लड़ने के लिए मैं एक अखबार में बतौर प्रूफ रीडर काम कर रहा था।' कहते-कहते उसने एक गहरी साँस ली।
'पर मीता तो सब जान कर भी अनजान बनी रही, नतीजा तुम्हारे सामने है। अब डेढ़ सालों से बेकार पड़ा हूँ, शरीर जैसे गल गया है, मीता ने ही घर और बाहर सँभाल रखा है, कहते हुए उसकी आँखें मुँदने लगी। मैं घबरा कर उठ खड़ा हुआ।
'सुनो', एकाएक उसकी पलकें ऊपर उठीं - 'मेरे बाद मीता का ख्याल रख सकोगे। जानता हूँ तुम उससे प्यार करते हो।' किसी अदृश्य ताकत ने मेरी गर्दन सहमति में हिलाई।
चाय के दौरान विभांशु ठहाके लगाता रहा और उसके इसरार पर मीता ने उसकी कई कवितायें सुनाईं। लौटते समय मीता मुझे छोड़ने दरवाजे तक आई। 'कितना खुश था न विभु?'  उसने चहकते हुए कहा, 'किसी रोज उसकी कविताएँ खुद उसके मुँह से सुनना, बहुत अच्छा लगेगा। मैंने सहमति में सिर हिलाया और लौट पड़ा। चौराहे पर मोड़ काटते ही पता नहीं क्यों मैं अँधाधुँध भाग खड़ा हुआ। किसी के आखिरी शब्द मेरा पीछा कर रहे थे -'फिर आना!'


(अमित पुरोहित)

Thursday, October 18, 2012

Toba Tek Singh ...................टोबा टेक सिंह




















बँटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख़्याल आया कि अख़्लाक़ी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिंदुस्तान के पागलखानों में हैं, उन्हें पाकिस्तान पहुँचा दिया जाए और जो हिंदू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में हैं, उन्हें हिंदुस्तान के हवाले कर दिया जाए। मालूम नहीं, यह बात माक़ूल थी या ग़ैर माक़ूल, बहरहाल दानिशमंदों के फ़ैसले के मुताबिक़ इधर-उधर ऊँची सतह की कान्फ्रेंसें हुईं और बिलआख़िर पागलों के तबादले के लिए एक दिन मुक़र्रर हो गया।

अच्छी तरह छानबीन की गई- वे मुसलमान पागल जिनके लवाहिक़ीन हिंदुस्तान ही में थे, वहीं रहने दिए गए, जितने हिंदू-सिख पागल थे, सबके-सब पुलिस की हिफाज़त में बॉर्डर पह पहुंचा दिए गए।

उधर का मालूम नहीं लेकिन इधर लाहौर के पागलख़ाने में जब इस तबादले की ख़बर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चिमेगोइयाँ (गपशप) होने लगीं।

एक मुसलमान पागल जो 12 बरस से, हर रोज़, बाक़ायदगी के साथ “ज़मींदार” पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा, “मौलवी साब, यह पाकिस्तान क्या होता है?” तो उसने बड़े ग़ौरो-फ़िक़्र के बाद जवाब दिया, “हिंदुस्तान में एक ऐसी जगह है जहाँ उस्तरे बनते हैं।” यह जवाब सुनकर उसका दोस्त मुतमइन हो गया।

इसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा, “सरदार जी, हमें हिंदुस्तान क्यों भेजा जा रहा है। हमें तो वहाँ की बोली नहीं आती।”

Woh Pal.........................वो पल





























बंद करके रख दिए
वो पल वो शब्द
वो वाकये जो आह्लादित
मलय की सुगंध देते थे ,
मन की तिजौरी में,
और वक़्त की बांह पकड़े
उड़ चली कल्पना लोक में
सोचा जब थक जाऊं
मन वितृष्णा  से भर जाए
विरक्ति अपने पंजे में
जकड़ने लगे
गमों   के बादल
आँखों में बसेरा कर लें
जीवन आख्याति
समापन का रुख करे
तब खोल दूंगी ये तिजौरी
और लम्बा श्वांस
लेकर आत्मसात कर लूँगी
इस सुगंध को
नव्य जीवन की ऊर्जा  हेतु !!

( राजेश कुमारी )

Photo credit 
Max Gasparini



Monday, October 15, 2012

Woh acha hai to acha hai...
























Woh acha hai to acha hai, bura hai ,to bhi acha hai
mizaaj-e-Ishq mein Aieb-e-yaar dekhe nahi jaate.


वो अच्छा है तो ,अच्छा है...बुरा है, तो भी अच्छा है"
"मिज़ाज-ए-इश्क में,  ऐब-ए-यार देखे नहीं जाते...


(Aieb-E-Yaar: Weaknesses of a friend)


Munawwar Rana 

Art Credit: Arti Chauhan

Search This Blog