"रहे न रहें हम, महका करेंगे..." भारतीय संगीत के इतिहास का एक ऐसा अनमोल मोती है, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। फिल्म 'ममता' (1966) का यह गीत प्रेम, यादों और अमरता का सबसे खूबसूरत उदाहरण है।
यहाँ इस गीत से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है:
गीत का विवरण
फिल्म: ममता (1966)
संगीतकार: रोशन (Roshan)
गीतकार: मजरूह सुल्तानपुरी
मुख्य कलाकार: सुचित्रा सेन, अशोक कुमार और धर्मेन्द्र
इस गीत के तीन अलग संस्करण (Versions)
दिलचस्प बात यह है कि इस गीत को फिल्म में तीन अलग-अलग आवाजों में पेश किया गया था:
लता मंगेशकर (Solo): यह सबसे प्रसिद्ध संस्करण है, जिसे सुचित्रा सेन पर फिल्माया गया है।
मो. रफ़ी और सुमन कल्याणपुर (Duet): यह संस्करण भी बहुत लोकप्रिय है और इसमें एक अलग तरह का सुकून है।
लता मंगेशकर (Sad Version): इसे फिल्म के एक भावुक मोड़ पर इस्तेमाल किया गया है।
गीत की खासियत
संगीत: रोशन साहब ने इस गाने में सारंगी और बांसुरी का बहुत ही महीन इस्तेमाल किया है, जो दिल में एक मीठा सा दर्द पैदा करता है।
शायरी: मजरूह सुल्तानपुरी के बोल, "बन के कली, बन के सबा, बागे-वफ़ा में..." आज भी रूह को सुकून देते हैं।
सुमन कल्याणपुर और लता जी: अक्सर लोग सुमन कल्याणपुर की आवाज़ को लता जी की आवाज़ समझ लेते थे। इस फिल्म में दोनों ने एक ही गाने के अलग-अलग वर्ज़न गाकर अपनी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
गीत के बोल (मुख्य अंश)
"रहे न रहें हम, महका करेंगे बन के कली, बन के सबा, बागे-वफ़ा में रहे न रहें हम..."
ममता (1966) एक ऐसी फिल्म है जो अपनी कहानी और संगीत दोनों के लिए आज भी याद की जाती है। चूँकि आपने 'जी' कहा, तो चलिए इस फिल्म और संगीतकार रोशन के बारे में कुछ खास बातें साझा करता हूँ:
फिल्म 'ममता' की कहानी
यह फिल्म एक माँ (सुचित्रा सेन) के त्याग की कहानी है। सुचित्रा सेन ने इसमें दोहरी भूमिका (Double Role) निभाई थी—एक माँ की और दूसरी उसकी बेटी की। यह बंगाली फिल्म 'उत्तर फाल्गुनी' की रीमेक थी। माँ अपनी बेटी को समाज में एक सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए खुद को दूर रखती है।
संगीतकार रोशन का जादू
रोशन साहब (जो वर्तमान अभिनेता ऋतिक रोशन के दादा थे) अपनी धुनों में शास्त्रीय संगीत (Classical Music) का बहुत सुंदर प्रयोग करते थे।
इस फिल्म के अन्य गाने भी उतने ही लाजवाब हैं:
छुपा लो यूँ दिल में प्यार मेरा: (हेमंत कुमार और लता मंगेशकर) - यह गाना भी उतना ही अमर है।
विकल मोरा मनवा: (लता मंगेशकर) - शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक बेहतरीन रचना।
एक छोटी सी भेंट (Tribute)
संगीतकार रोशन, साहिर लुधियानवी और मजरूह सुल्तानपुरी की जोड़ी ने हमें ऐसे गाने दिए जो कभी पुराने नहीं होते। "रहे न रहें हम" आज भी विदाई या यादों के समय गाया जाने वाला सबसे पसंदीदा गाना है।
"मौसम कोई हो, इस चमन में, रंग बन के रहेंगे हम" (यह पंक्ति सिखाती है कि इंसान चला जाता है, लेकिन उसके अच्छे काम और यादें हमेशा महकती रहती हैं।)
(This video is posted by channel – {crazyoldsongs}
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