अपने ही बुने जालों में फंसा मन
जाने कब शांति को कहाँ दूर छोड़ आया?
"कुछ" और पाने की चाह में
मिले को भी गंवाता जाता
पर ये "कुछ" और परिभाषित क्यों नहीं हो पाता ?
कहाँ जाकर रुकेगी
अनजान राहों पर चलने की मन की फिसलन ?
राकेश
अपने ही बुने जालों में फंसा मन
जाने कब शांति को कहाँ दूर छोड़ आया?
"कुछ" और पाने की चाह में
मिले को भी गंवाता जाता
पर ये "कुछ" और परिभाषित क्यों नहीं हो पाता ?
कहाँ जाकर रुकेगी
अनजान राहों पर चलने की मन की फिसलन ?
राकेश
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