The video is the second and final part of the 1988 Doordarshan television series, Mirza Ghalib.
Series Overview
Subject: The series chronicles the life, times, and poetry of the legendary Urdu and Persian poet, Mirza Asadullah Khan Ghalib (1797–1869).
Director/Writer: The series was written and directed by the renowned poet and filmmaker Gulzar.
Starring: The title role of Mirza Ghalib is famously played by Naseeruddin Shah, with Tanvi Azmi portraying his wife, Umrao Begum.
Music: The series is particularly celebrated for its unforgettable ghazals, sung by Jagjit Singh and Chitra Singh, which brought Ghalib's poetry to life for a new generation.
The content of this Part 2/2 video likely covers the later stages of the poet's life, including his struggles, his tenure as a court poet, his profound relationship with his craft, and his eventual decline, all set against the backdrop of a declining Mughal Empire and the tumultuous events of the 1857 Indian Rebellion.
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Musalsal bhaagti zindagi mein... मुसलसल भागती ज़िंदगी में .... aehsaan faraamosh sa din.. अहसान -फ़रामोश सा दिन . tajarbon ko jab.. तजुर्बो को जब, shaam ki thandi hatheli pe rakhta hai... शाम की ठंडी हथेली पर रखता है...... zehan ki jeib se . ज़ेहन की जेब से, kuch tassavvur farsh pe bichaata hoon.... कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
fursat ki chaadar kheenchkar... फ़ुरसत की चादर खींचकर.. uske tale pair phailaata hoon....
उसके तले पैर फैलाता हूँ ek nazm girebaan pakad ke mera...
एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
pata poochti hai mujhse... पता पूछती है मुझसे "Bata to "बता तो tu kahaan tha?"..... तू कहाँ था?" ........
This ghazal was posted by Saregama Ghazal on Youtube. "Rasm-e-Ulfat Ko Nibhaye" is a timeless ghazal known for its profound lyrics, soulful composition, and the legendary voice of Lata Mangeshkar. Here are some detailed aspects of this classic:
Artist and Music: The ghazal is sung by the revered Lata Mangeshkar, and the music is composed by the maestro Madan Mohan. Their collaboration on this piece is widely celebrated. The composition is noted for its ability to convey deep emotion, and it is said that even the great music director Naushad praised Madan Mohan for this ghazal.
यह गाना 'हम बेखुदी में तुम को पुकारे चले गए' हिंदी सिनेमा के सबसे मधुर और सदाबहार गीतों में से एक है।
गीत का विवरण (Song Details)
विवरण
जानकारी
फिल्म (Movie)
काला पानी (Kala Pani)
रिलीज़ वर्ष (Release Year)
1958
गायक (Singer)
मोहम्मद रफ़ी (Mohammed Rafi)
संगीत निर्देशक (Music Director)
एस. डी. बर्मन (S. D. Burman)
गीतकार (Lyricist)
मजरूह सुल्तानपुरी (Majrooh Sultanpuri)
कलाकार (Star Cast)
देव आनंद (Dev Anand), मधुबाला (Madhubala), नलिनी जयवंत (Nalini Jaywant)
रोचक तथ्य (Interesting Fact)
देव आनंद और एस. डी. बर्मन का जादू: यह गीत उस ज़माने की सबसे सफल संगीतकार-अभिनेता जोड़ियों में से एक, एस. डी. बर्मन और देव आनंद के तालमेल का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। बर्मन दा ने देव आनंद की कई फिल्मों के लिए यादगार संगीत दिया, और यह गाना उनकी रचनात्मक साझेदारी की गहराई को दर्शाता है।
मोहम्मद रफ़ी की भावपूर्ण आवाज़: इस गाने को मोहम्मद रफ़ी की सबसे बेहतरीन रचनाओं में गिना जाता है। जिस तरह से उन्होंने गाने में तड़प, नशा और बेखुदी (unconsciousness/intoxication) के भावों को अपनी आवाज़ से व्यक्त किया है, वह इसे एक कालातीत क्लासिक (timeless classic) बनाता है।
मजरूह सुल्तानपुरी के बोल: मजरूह सुल्तानपुरी के गीत ऐसे हैं जो एक नशे में डूबे व्यक्ति की पीड़ा को दर्शाते हैं, जो अपनी प्रियतमा को पुकारता चला जाता है। उनके सरल लेकिन गहरे बोल इस गाने को भावनात्मक ऊँचाई प्रदान करते हैं।
यह गीत आज भी पुरानी हिंदी फिल्मों के संगीत प्रेमियों के बीच बहुत लोकप्रिय है।
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"रहे न रहें हम, महका करेंगे..." भारतीय संगीत के इतिहास का एक ऐसा अनमोल मोती है, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। फिल्म 'ममता' (1966) का यह गीत प्रेम, यादों और अमरता का सबसे खूबसूरत उदाहरण है।
यहाँ इस गीत से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है:
गीत का विवरण
फिल्म: ममता (1966)
संगीतकार: रोशन (Roshan)
गीतकार: मजरूह सुल्तानपुरी
मुख्य कलाकार: सुचित्रा सेन, अशोक कुमार और धर्मेन्द्र
इस गीत के तीन अलग संस्करण (Versions)
दिलचस्प बात यह है कि इस गीत को फिल्म में तीन अलग-अलग आवाजों में पेश किया गया था:
लता मंगेशकर (Solo): यह सबसे प्रसिद्ध संस्करण है, जिसे सुचित्रा सेन पर फिल्माया गया है।
मो. रफ़ी और सुमन कल्याणपुर (Duet): यह संस्करण भी बहुत लोकप्रिय है और इसमें एक अलग तरह का सुकून है।
लता मंगेशकर (Sad Version): इसे फिल्म के एक भावुक मोड़ पर इस्तेमाल किया गया है।
गीत की खासियत
संगीत: रोशन साहब ने इस गाने में सारंगी और बांसुरी का बहुत ही महीन इस्तेमाल किया है, जो दिल में एक मीठा सा दर्द पैदा करता है।
शायरी: मजरूह सुल्तानपुरी के बोल, "बन के कली, बन के सबा, बागे-वफ़ा में..." आज भी रूह को सुकून देते हैं।
सुमन कल्याणपुर और लता जी: अक्सर लोग सुमन कल्याणपुर की आवाज़ को लता जी की आवाज़ समझ लेते थे। इस फिल्म में दोनों ने एक ही गाने के अलग-अलग वर्ज़न गाकर अपनी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
गीत के बोल (मुख्य अंश)
"रहे न रहें हम, महका करेंगे
बन के कली, बन के सबा, बागे-वफ़ा में
रहे न रहें हम..."
ममता (1966) एक ऐसी फिल्म है जो अपनी कहानी और संगीत दोनों के लिए आज भी याद की जाती है। चूँकि आपने 'जी' कहा, तो चलिए इस फिल्म और संगीतकार रोशन के बारे में कुछ खास बातें साझा करता हूँ:
फिल्म 'ममता' की कहानी
यह फिल्म एक माँ (सुचित्रा सेन) के त्याग की कहानी है। सुचित्रा सेन ने इसमें दोहरी भूमिका (Double Role) निभाई थी—एक माँ की और दूसरी उसकी बेटी की। यह बंगाली फिल्म 'उत्तर फाल्गुनी' की रीमेक थी। माँ अपनी बेटी को समाज में एक सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए खुद को दूर रखती है।
संगीतकार रोशन का जादू
रोशन साहब (जो वर्तमान अभिनेता ऋतिक रोशन के दादा थे) अपनी धुनों में शास्त्रीय संगीत (Classical Music) का बहुत सुंदर प्रयोग करते थे।
इस फिल्म के अन्य गाने भी उतने ही लाजवाब हैं:
छुपा लो यूँ दिल में प्यार मेरा: (हेमंत कुमार और लता मंगेशकर) - यह गाना भी उतना ही अमर है।
विकल मोरा मनवा: (लता मंगेशकर) - शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक बेहतरीन रचना।
एक छोटी सी भेंट (Tribute)
संगीतकार रोशन, साहिर लुधियानवी और मजरूह सुल्तानपुरी की जोड़ी ने हमें ऐसे गाने दिए जो कभी पुराने नहीं होते। "रहे न रहें हम" आज भी विदाई या यादों के समय गाया जाने वाला सबसे पसंदीदा गाना है।
"मौसम कोई हो, इस चमन में, रंग बन के रहेंगे हम"
(यह पंक्ति सिखाती है कि इंसान चला जाता है, लेकिन उसके अच्छे काम और यादें हमेशा महकती रहती हैं।)
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"ओ सजना बरखा बहार आई" भारतीय सिनेमा का एक ऐसा मास्टरपीस है, जिसे आज भी बारिश के बेहतरीन गीतों में सबसे ऊपर रखा जाता है। बिमल रॉय की फिल्म 'परख' (1960) का यह गाना अपनी सादगी और सुरीलेपन के लिए दुनिया भर में मशहूर है।
यहाँ इस गीत से जुड़ी कुछ विशेष और रोचक जानकारियाँ दी गई हैं:
गीत का मुख्य विवरण
गायिका: लता मंगेशकर
संगीतकार: सलिल चौधरी (Salil Chowdhury)
गीतकार: शैलेन्द्र
कलाकार: साधना (Sadhana) और वसंत चौधरी
इस गीत की खास बातें
बंगाली मूल (Bengali Origin): यह गाना पहले एक बंगाली गैर-फिल्मी गीत के रूप में रिकॉर्ड किया गया था, जिसके बोल थे "ना जेओ ना" (Na Jeo Na)। सलिल दा ने ही इसकी मूल धुन तैयार की थी, जिसे बाद में उन्होंने 'परख' के लिए हिंदी में ढाल दिया।
संगीत की विशेषता: सलिल चौधरी ने इस गाने में सितार का बहुत ही अनोखा और सुंदर उपयोग किया है। गाने की शुरुआत में सितार की जो धुन बजती है, वह गिरती हुई बारिश की बूंदों का एहसास दिलाती है।
न्यूनतम साज़ (Minimal Instruments): इस गाने में बहुत ज़्यादा वाद्य यंत्रों का उपयोग नहीं किया गया है, ताकि लता जी की आवाज़ की कोमलता और मधुरता पूरी तरह उभर कर आए।
साधना का अभिनय: यह अभिनेत्री साधना की शुरुआती फिल्मों में से एक थी। उनकी मासूमियत और सादगी ने इस गाने को विज़ुअली भी अमर बना दिया।
कहानी का हिस्सा: फिल्म में साधना एक पोस्टमास्टर की बेटी का किरदार निभा रही हैं और वह बारिश के बीच अपने प्रेमी (जो एक स्कूल मास्टर है) को याद करते हुए यह गीत गाती हैं।
गीत के बोल (मुख्य अंश)
"ओ सजना, बरखा बहार आई
रस की फुहार लाई, अखियों में प्यार लाई..."
सलिल चौधरी का जादुई संगीत
सलिल दा को "द लेजेंडरी कंपोजर" कहा जाता था क्योंकि वे वेस्टर्न क्लासिकल और इंडियन फोल्क को मिलाना जानते थे।
इस गाने में उन्होंने 'सितार' का जो इस्तेमाल किया है, वह संगीत की दुनिया में एक मिसाल है। सितार की हर तान बारिश की एक बूंद की तरह महसूस होती है।
उन्होंने इस गाने में 'पॉलिफोनी' (Polyphony) तकनीक का इस्तेमाल किया था, जो उस समय के भारतीय संगीत में बहुत कम देखी जाती थी।
3. फिल्म 'परख' के अन्य बेहतरीन गीत
अगर आपको "ओ सजना" पसंद है, तो आपको इस फिल्म के ये गाने भी जरूर सुनने चाहिए:
"मिला है किसी का झुमका" - लता मंगेशकर (एक बहुत ही चुलबुला गाना)
"मेरे मन के दिए" - लता मंगेशकर (एक बहुत ही शांत और गहरा गाना)
फिल्म 'परख' के बारे में एक छोटी सी बात:
यह फिल्म एक सामाजिक व्यंग्य (Social Satire) थी, जिसे महान निर्देशक बिमल रॉय ने बनाया था। फिल्म यह परखती है कि लालच के सामने इंसान की ईमानदारी कितनी टिक पाती है।
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