Sunday, November 25, 2012

जिज्ञासा..................(kahani agyey ji ki )


ईश्वर ने सृष्टि की। सब ओर निराकार शून्य था, और अनन्त आकाश में अन्धकार छाया हुआ था। ईश्वर ने कहा, ‘प्रकाश हो’ और प्रकाश हो गया। उसके आलोक में ईश्वर ने असंख्य टुकड़े किये और प्रत्येक में एक-एक तारा जड़ दिया। तब उसने सौर-मंडल बनाया, पृथ्वी बनायी। और उसे जान पड़ा कि उसकी रचना अच्छी है।

तब उसने वनस्पति, पौधे, झाड़-झंखाड़, फल फूल, लता-बेलें उगायीं; और उन पर मँडराने को भौंरे और तितलियाँ, गाने को झींगुर भी बनाए।

तब उसने पशु-पक्षी भी बनाये। और उसे जान पड़ा कि उसकी रचना अच्छी है।

लेकिन उसे शान्ति न हुई। तब उसने जीवन में वैचित्र्य लाने के लिए दिन और रात, आँधी-पानी, बादल-मेंह, धूप-छाँह इत्यादि बनाये; और फिर

Thursday, November 22, 2012

Qareeb reh ke sulagne se ........क़रीब रह के सुलगने से




Qareeb reh ke sulagne se kitna behtar tha..
Kisi maqaam pe hum tum bichar gaye hotey...
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क़रीब  रह के सुलगने से कितना बेहतर था 
किसी मुक़ाम पर हम तुम बिछड़ गए होते.....

Noshi Gilani

Painting by Erica Hopper

Shararat Le ke Ankho Mein ..


Shararat Le ke Ankhon  Mein ,Wo Us ka Dekhna Touba
Main Nazron Pe Jami Nazrein Jhuka ana Bhool Jataa hoon .....

शरारत लेके आँखों में , वो उसका देखना तौबा 
मैं नज़रों पे जमी नज़रें झुकाना भूल जाता हूँ .... 

Unknown

Anjaam-e-Ishq sunaata hun.....अंजाम-ए -इश्क़ सुनाता हूँ....


Anjaam-e-Ishq sunaata hun,  tavajjo se suniye,
Majboriyan, Rusvaiyan, Tanhaiyan,  phir.. Maut

अंजाम-ए -इश्क़ सुनाता हूँ ,तवज्जो से सुनिए 
मजबूरियाँ , रुसवाईयाँ , तन्हाईयाँ , फिर.. मौत 

(Unknown)

Itne kahaan masroof ho....इतने कहाँ मसरूफ हो....


Itne kahaan masroof ho gaye ho ..
Dil dukhane bhi ab nahi aatey.!!

इतने कहाँ मसरूफ हो गए हो 
दिल दुखाने भी अब नहीं आते 

(Namaloom)

Photo Credit -Unknown

Chalo ye Zindagi bhi ab tumhare...






















चलो, ये ज़िन्दगी भी ..अब तुम्हारे नाम करते हैं... 
सुना है, बेवफ़ा की बेवफ़ा से ..ख़ूब बनती है..!!


Chalo ye zindagi bhi ab tumhare naam karte hain..
Suna hai bewafa ki ,bewafa se.... khuub banti hai..

unknown 



Painting by Edward Henry Potthast

हम हैं संक्रमण काल की औरतें........



हम हैं संक्रमण काल की औरतें

साबुत न बचने की हद तक...
साबित करती रहेंगी हम कि हे दंडाधिकारियो..
गलत नही थे हमें ज़िंदा बख्श दिए जाने के तुम्हारे फैसले

हमने किये विवाह तो साबित हो गये सौदे
हमने किये प्रेम तो कहलाये बदचलन..
हमने किये विद्रोह तो घोषित कर दिए गये बेलगाम

छाँटे गये थे हम मंडी में ताज़ी सब्जियों की तरह
दुलराये गये थे कुर्बानी के बकरे से..
विदा किये गये थे सरायघरों के लिए..
जहां राशन की तरह मिलते थे मालिकाना हक

आंके गये थे मासिक तनख्वाओं,सही वक्त पर जमा हुए बिलों,स्कूल के रिपोर्ट कार्डों,
घर भर की फेंग शुई और शाइनिंग फेमिली के स्लोगन से..
और इस चमकाने में ही बुझ गईं थीं हमारी उम्रें
चुक गईं सपनो से अंजी जवान आँखें..

हमसे उम्मीदों की फेहरिश्त उतनी ही लम्बी है
जितनी लम्बी थी दहेज़ की लिस्ट..
शरीर की नाप तोल,रंग,रसोई,डिग्रियां और ड्राइंगरूम से तोले गये थे हम

क्लब में जाएँ तो चुने जाने की सबसे शानदार वजहें सी लगें
रसोई में हों तो भुला दें तरला दलाल की यादें..
इतनी उबाऊ भी न हो जाएँ कि हमारी जगहों पर आ जाएँ मल्लिकाएं

सीता सावित्री विद्योत्तमा और रम्भा ही नही

हम में स्थापित कर दी गईं हैं अहिल्याएँ....
लक्ष्मण रेखा के दोनों और कस दिए गये हमारे पाँव
हमारे पुरुष निकल चुके हैं विजय यात्राओं पर..

हमने कहा, सहमत नही हैं हम
हमारे रास्ते भर दिए गये आग के दरिया,खारे पानी के समुन्दरों और कीचड़ के पोखरों से
नासूर हैं हमारे विद्रोह , लड़ रहे हैं हम गोरिल्ला युद्ध
खत्म हो रहे हैं आत्मघाती दस्तों से ..

हमारी बच्चियों
हमारी मुस्कुराहटों के पीछे..
कहाँ देख पाओगी हमारे लहूलुहान पैरों के निशान
हमारे शयनकक्षों में सूख चुके होंगे बेआवाज बहाए गये आंसुओं से तर तकिये
सीनों में खत्म हुए इंकार भी,अच्छा हो कि दफ्न हो जाएँ हमारे ही साथ..

हमारी कोशिश है कि खोल ही जाएँ
तुम्हारे लिए, कम से कम वह एक दरवाजा
जिस पर लिखा तो है 'क्षमया धरित्री'
किन्तु दबे पाँव दबोचती है धीमे जहर सी
गुमनाम मौतें...

इसलिए,जब भी तुम कहोगी हमसे 'विदा'
तुम्हारे साथ ही कर देंगे हल्दी सने हाथों वाले तमाम दरवाजे
ताकि आ सको वापस उन्ही में से ..
खुली आँखों से खाई,कई कई चोटों के साथ !!

(वंदना शर्मा)

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