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Thursday, April 19, 2012
Tere baare mein jab socha nahi thaa (Jagjit Singh)
BADI NAZUK HAI JAGJIT SINGH
KISI NAZAR KO TERA INTEZAR AAJ BHI HAI
"किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है" फिल्म एतबार (1985) का एक बेहद भावुक और अमर गीत है। मूल रूप से इसे भूपिंदर सिंह और आशा भोसले ने गाया था
यहाँ इस गज़लनुमा गीत की मुख्य जानकारी दी गई है:
गीत का विवरण (मूल फिल्म)
गायक: भूपिंदर सिंह और आशा भोसले
संगीतकार: बप्पी लाहिड़ी (Bappi Lahiri)
गीतकार: हसन कमाल
फिल्म: एतबार (1985)
कलाकार: राज बब्बर, डिंपल कपाड़िया और सुरेश ओबेरॉय
इस गीत की मुख्य विशेषताएँ
बप्पी लाहिड़ी का अलग अंदाज़: बप्पी दा आमतौर पर 'डिस्को' संगीत के लिए जाने जाते थे, लेकिन इस गाने में उन्होंने दिखाया कि वे शास्त्रीय और भावुक धुनों में भी कितने माहिर थे।
शायरी की गहराई: हसन कमाल के बोल बहुत ही मार्मिक हैं। "वो प्यार जिसके लिए हमने छोड़ दी दुनिया, वफ़ा की राह में घायल वो प्यार आज भी है"—ये पंक्तियाँ टूटे हुए दिल की दास्तां बयां करती हैं।
गीत के बोल (मुख्य अंश)
"किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है कहाँ हो तुम कि ये दिल बेकरार आज भी है किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है..."
एक रोचक तथ्य
फिल्म 'एतबार' प्रसिद्ध हॉलीवुड फिल्म 'डायल एम फॉर मर्डर' (Dial M for Murder) पर आधारित थी। फिल्म एक सस्पेंस थ्रिलर थी, लेकिन यह गाना अपनी रूहानी मिठास के कारण फिल्म की पहचान बन गया।
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Monday, April 16, 2012
सवाल जवाब
आजकल
सवाल ही सवाल
खिलते हैं,
फूलों की तरह,
जवाब गुम-सुम से
मिट्टी में,
दबे रहते हैं …..!
(मंजू मिश्रा)
खुशियाँ
मिल जाएँ
खुशियाँ
मुट्ठी भर
तो
बीज बनाकर
छींट दूं उन्हें,
आँगन में !!
बारिश होगी,
अंकुर फूटेंगे
कलियाँ चटकेंगी,
रंग बिखरेंगे,
लहलहाएगी फसल…
भर जायेगा
ज़िंदगी का घर
खुशियों से !
(Manju Mishra)
कविता का पर्याय
दीपक से अधिक मूल्यवान होता है प्रकाश
पांडुलिपियों से अधिक मूल्यवान
होती हैं कविताएं
और अधरों से अधिक मूल्यवान होते हैं
उन पर रचे गए चुंबन।
तुमसे ..
मुझसे..
हम दोनों से..
बहुत अधिक मूल्यवान हैं मेरे प्रेमपत्र।
वे ही तो हैं वे दस्तावेज
जिनसे आने वाले समय में
जान पाएंगे लोगबाग
कि कैसा रहा होगा तुम्हारा सौंदर्य
और कितना मूल्यवान रहा होगा मेरा पागलपन।
तुम्हें जब कभी
जब भी कभी
तुम्हें मिल जाए वह पुरुष
जो परिवर्तित कर दे
तुम्हारे अंग-प्रत्यंग को कविता में।
वह जो कविता में गूंथ दे
तुम्हारी केश राशि का एक-एक केश।
जब तुम पा जाओ कोई ऐसा
ऐसा प्रवीण कोई ऐसा निपुण
जैसे कि इस क्षण मैं
करा रहा हूं कविता के जल से तुम्हें स्नान
और कविता के आभूषणों से ही कर रहा हूं
तुम्हारा श्रंगार।
अगर ऐसा हो कभी
तो मान लेना मेरी बात
अगर सचमुच ऐसा हो कभी
मान रखना मेरे अनुनय का
तुम चल देना उसी के साथ बेझिझक निस्संकोच।
महत्वपूर्ण यह नहीं है
कि तुम मेरी हो सकीं अथवा नहीं
महत्वूपूर्ण यह है
कि तुम्हें होना है कविता का पर्याय।
Sunday, April 15, 2012
Karoge Yaad Toh - Naseeruddin - Smita Patil - Bazaar - Bollywood Classic...
Film 'Bazaar' (1982) ka ye gaana "Karoge Yaad Toh Har Baat Yaad Aayegi" ek bahut hi gehri aur dard bhari ghazal hai. Ise Bhupinder Singh ne apni makhsoos bhari awaaz mein gaaya hai, jo seedhe dil mein utar jaati hai.
Ye raha is gaane ka poora vivaran:
Gaane ki Details:
Gaayak (Singer): Bhupinder Singh
Sangeetkar (Music): Khayyam
Geetkar (Lyrics): Bashar Nawaz
Film: Bazaar (1982)
Main Cast: Naseeruddin Shah, Smita Patil, Farooq Shaikh, Supriya Pathak
Is Gaane ki Khaasiyat:
Bhupinder Singh ki Awaaz: Bhupinder Singh ki awaaz mein jo thairav aur dard hai, wo is ghazal ko ek alag mukam par le jaata hai.
Khayyam ka Sangeet: Khayyam sahab ne bahut hi kam saazon (instruments) ke saath iski dhun banayi hai, taaki shayari ki gehrai mehsoos ho sake.
Naseeruddin aur Smita Patil: Gaane ke dauran Naseeruddin Shah aur Smita Patil ke chehre ke bhaav (expressions) unke beech ke ansuljhe rishte aur khamosh dard ko bayaan karte hain.
Shayari: "Karoge yaad toh har baat yaad aayegi..." - Ye line apne aap mein ek poori kahani hai, jo purani yaadon aur beete huye waqt ki yaad dilati hai.
Gaane ke Bol (Main Lines):
"Karoge yaad toh har baat yaad aayegi Guzarte waqt ki har mauj thehar jayegi..."
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Dekh Lo Aaj Humko Ji Bhar Ke - Farooq Sheikh - Supriya Pathak - Bazaar S...
Film 'Bazaar' (1982) ka ye gaana "Dekh Lo Aaj Humko Ji Bhar Ke" dard aur ehsaas se bhari hui ek bahut hi khoobsurat ghazal hai. Ise Jagjit Kaur (Khayyam sahab ki patni) ne apni bahut hi ranhani aur gehri awaaz mein gaya hai.
Is gaane ki kuch khaas baatein:
Gaane ka Vivaran:
Gayika (Singer): Jagjit Kaur
Sangeetkar (Music): Khayyam
Geetkar (Lyrics): Mirza Shauq (Mirza Shauq Lakhnavi)
Film: Bazaar (1982)
Kalakaar: Farooq Sheikh aur Supriya Pathak
Is Gaane ki Visheshtayein:
Gham aur Judayi ka Ehsaas: Ye gaana film ke sabse emotional mod par aata hai. Farooq Sheikh aur Supriya Pathak ke beech ki bebasi aur judayi ko ye gaana bahut hi gehrai se bayaan karta hai.
Jagjit Kaur ki Awaaz: Jagjit Kaur ne is ghazal ko jis tarah se nabaaya hai, wo unke singing career ke sabse behtareen kamo mein se ek hai. Unki awaaz mein jo thairav hai, wo Khayyam sahab ke sangeet ke saath milkar ek alag hi mahaul banata hai.
Classic Lyrics: Iske bol Mirza Shauq ki shayari se liye gaye hain, jo 19th century ke ek mashhoor shayar the. "Dekh lo aaj humko ji bhar ke, koi aata nahi hai phir marke" - ye line zindagi ki sacchai aur judayi ke dard ko dikhati hai.
Gaane ke Bol (Main Lines):
"Dekh lo aaj humko ji bhar ke Koi aata nahi hai phir marke Ab kahan hum kahan ye mehfil-e-yaar..."
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Dikhaayi Diye Yun - Farooq Sheikh - Supriya Pathak - Smita Patil - Nasee...
फिल्म 'बाज़ार' (1982) का यह गीत "दिखाई दिए यूँ कि बेख़ुद किया" न केवल एक गाना है, बल्कि एक मुकम्मल एहसास है। इसे लता मंगेशकर ने अपनी सबसे रेशमी आवाज़ में गाया है और संगीतकार खय्याम ने इसे एक अमर रचना बना दिया है।
यहाँ इस गीत की मुख्य जानकारी दी गई है:
गीत का विवरण
गायिका: लता मंगेशकर
संगीतकार: खय्याम
गीतकार: मीर तक़ी मीर (उनकी अमर गज़ल से लिया गया)
फिल्म: बाज़ार (1982)
कलाकार: फारूक शेख, सुप्रिया पाठक, स्मिता पाटिल और नसीरुद्दीन शाह
इस गीत की खास बातें
मीर तक़ी मीर की गज़ल: इस गीत के बोल 18वीं सदी के महान उर्दू शायर मीर तक़ी मीर की गज़ल से लिए गए हैं। खय्याम साहब ने इन पुराने शब्दों को आधुनिक संगीत में इतनी खूबसूरती से ढाला है कि यह आज भी ताजा लगता है।
संगीत की सादगी: खय्याम साहब ने इस गाने में साज़ों (instruments) का बहुत ही कम लेकिन प्रभावी इस्तेमाल किया है। लता जी की आवाज़ को मुख्य रखा गया है, जो सीधे रूह को छूती है।
अभिनय का जादू: गाने के दौरान सुप्रिया पाठक की मासूमियत और फारूक शेख के साथ उनकी केमिस्ट्री बहुत ही सादगी भरी और सुंदर दिखती है। साथ ही स्मिता पाटिल और नसीरुद्दीन शाह के किरदारों की मौजूदगी कहानी में गहराई जोड़ती है।
गीत के बोल (मुख्य अंश)
"दिखाई दिए यूँ कि बेख़ुद किया हमें आप से भी जुदा कर चले..."
फिल्म 'बाज़ार' का संगीत
इस फिल्म का पूरा एल्बम ही एक क्लासिक है। खय्याम साहब ने इस फिल्म के लिए उर्दू शायरी के रत्नों को चुना था:
"दिखाई दिए यूँ" (मीर तक़ी मीर)
"देख लो आज हमको" (मिर्ज़ा शौक़)
"फिर छिड़ी रात" (मखदूम मोहिउद्दीन)
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Pyar Mujh Se Jo Kiya Tumne - Deepti Naval - Farooque Sheikh - Saath Saat...
फिल्म 'साथ साथ' (1982) का यह गीत "प्यार मुझसे जो किया तुमने" गज़ल और फिल्मी संगीत का एक बहुत ही सुंदर मिश्रण है। इसे जगजीत सिंह ने अपनी उस जादुई आवाज़ में गाया है जो सीधे दिल की गहराइयों तक पहुँचती है।
यहाँ इस गीत की मुख्य जानकारी दी गई है:
गीत का विवरण
गायक: जगजीत सिंह
संगीतकार: कुलदीप सिंह
गीतकार: जावेद अख्तर
फिल्म: साथ साथ (1982)
कलाकार: फारूक शेख और दीप्ति नवल
इस गीत की खास बातें
कृतज्ञता का भाव: यह गीत एक प्रेमी द्वारा अपनी प्रेमिका के प्रति आभार (gratitude) व्यक्त करने जैसा है। इसके बोल बताते हैं कि साथी के प्यार ने जीवन को कितना आसान और सुंदर बना दिया है।
जावेद अख्तर की गहराई: "प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी, मेरे हालात की आंधी में बिखर जाओगी"—इन पंक्तियों में जावेद साहब ने एक तरफ प्यार की ताकत और दूसरी तरफ जीवन की अनिश्चितताओं को बहुत खूबसूरती से दिखाया है।
यथार्थवादी चित्रण: फिल्म 'साथ साथ' अपने समय की उन चुनिंदा फिल्मों में से थी जो मध्यमवर्गीय जीवन के संघर्षों को बहुत ईमानदारी से दिखाती थी। यह गाना उस संघर्ष के बीच एक सुकून देने वाली ठंडी हवा के झोंके जैसा है।
गीत के बोल (मुख्य अंश)
"प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी मेरे हालात की आंधी में बिखर जाओगी रंज-ओ-ग़म के सिवा कुछ भी नहीं पास मेरे क्या हुआ जो मेरी दुनिया को संवारोगी..."
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Tum Ko Dekha Toh Ye Khayal - Deepti Naval - Farooque Sheikh - Saath Saat...
फिल्म 'साथ साथ' (1982) का यह गीत "तुमको देखा तो ये ख्याल आया" न केवल एक गाना है, बल्कि हिंदी गज़ल के इतिहास की एक अनमोल धरोहर है। जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की आवाज़ में यह गीत आज भी हर पीढ़ी के दिलों पर राज करता है।
यहाँ इस गीत की मुख्य जानकारी दी गई है:
गीत का विवरण
गायक: जगजीत सिंह और चित्रा सिंह
संगीतकार: कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh)
गीतकार: जावेद अख्तर
फिल्म: साथ साथ (1982)
कलाकार: फारूक शेख और दीप्ति नवल
इस गीत की खास बातें
जावेद अख्तर की लेखनी: इस गीत के माध्यम से जावेद अख्तर ने आम जीवन की खुशियों और संघर्षों को बहुत ही सरल लेकिन दिल छू लेने वाले शब्दों में पिरोया है। "ज़िन्दगी धूप, तुम घना साया" - यह पंक्ति आज भी बहुत लोकप्रिय है।
जगजीत-चित्रा की जोड़ी: जगजीत सिंह की रेशमी आवाज़ और चित्रा सिंह का साथ इस गज़ल को एक रूहानी अनुभव बना देता है।
फारूक शेख और दीप्ति नवल: इस जोड़ी की सादगी और फिल्म की यथार्थवादी (realistic) कहानी ने इस गाने को दर्शकों के और करीब ला दिया। यह गाना एक मध्यमवर्गीय परिवार के प्रेम और विश्वास को दर्शाता है।
सादगी भरा संगीत: कुलदीप सिंह ने गिटार और बाँसुरी के न्यूनतम इस्तेमाल के साथ एक ऐसी धुन तैयार की जो सुनने वाले के मन में बस जाती है।
गीत के बोल (मुख्य अंश)
"तुमको देखा तो ये ख्याल आया ज़िन्दगी धूप तुम घना साया..."
रोचक तथ्य
फिल्म 'साथ साथ' और इसका संगीत उस समय के गज़ल प्रेमियों के लिए एक तोहफा था। इस फिल्म के अन्य गीत जैसे "ये तेरा घर ये मेरा घर" और "प्यार मुझसे जो किया तुमने" भी बहुत बड़े हिट रहे।
Saturday, April 14, 2012
Dil Dhadkane Ka Sabab Yaad Aaya
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Friday, April 13, 2012
लकीरें
लकीरें
अपने स्वभाव से चलती हैं
हमेशा नहीं होतीं लकीरें
समानांतर एक-दूसरे के
कि चलती रहें एक साथ
अनंत तक अनादि तक
तिर्यक भी नहीं होती हर रेखा
कि दूसरी को बस
निकल जाए स्पर्श करते हुए
यह भी ज़रूरी नहीं
साथ चलती दो लकीरें
कभी-न-कभी निकलेंगी
एक-दूसरे को काटते हुए
किसी आयत या वर्ग का
विकर्ण भी नहीं होतीं सब लकीरें
कि उल्टे-सीधे, आगे-पीछे चलते
एक ही बिंदु पर मिलें हर बार
ऐसा भी बहुधा नहीं होता
कि एक-दूसरे से सटकर चलें ही
तो लगे
दो नहीं एक ही लकीर है वहां
वक्र चाल ही चलती हैं
अधिकतर लकीरें
एक-दूसरे में मिलती प्रतीत होती हैं
और झट से निकल जाती हैं
एक-दूसरे से दूर
कोई नया मोड़ लेकर
लकीरें कभी नहीं बदलतीं अपना स्वभाव
रिश्तों को लकीरें समझकर चलो तो
आधे दुःख निरर्थक हो जाते हैं
- अजय गर्ग
इतने ऊँचे उठो
इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥
नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥
लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धन, रुके न चिंतन
गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।
चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है!
(द्वारिका प्रसाद महेश्वरी )
Wednesday, April 11, 2012
इस बार नहीं.........
इस बार नहीं
इस बार जब वोह छोटी सी बच्ची मेरे पास अपनी खरोंच ले कर आएगी
मैं उसे फू फू कर नहीं बहलाऊँगा
पनपने दूँगा उसकी टीस को
इस बार नहीं
इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखा देखूँगा
नहीं गाऊँगा गीत पीड़ा भुला देने वाले
दर्द को रिसने दूँगा,उतरने दूँगा अन्दर गहरे
इस बार नहीं .........
इस बार मैं न मरहम लगाऊँगा
न ही उठाऊँगा रुई के फाहे
और न ही कहूँगा कि तुम आंखें बंद करलो, गर्दन उधर कर लो मैं दवा लगाता हूँ
देखने दूँगा सबको हम सबको खुले नंगे घाव
इस बार नहीं......
इस बार जब उलझने देखूँगा, छटपटाहट देखूँगा
नहीं दौडूंगा उलझी डोर लपेटने, उलझने दूँगा जब तक उलझ सके
इस बार नहीं........
इस बार कर्म का हवाला दे कर नहीं उठाऊँगा औजार
नहीं करूंगा फिर से एक नयी शुरुआत, नहीं बनूँगा मिसाल एक कर्मयोगी की
नहीं आने दूँगा ज़िन्दगी को आसानी से पटरी पर
उतरने दूँगा उसे कीचड मैं, टेढे मेढे रास्तों पे
नहीं सूखने दूँगा दीवारों पर लगा खून
हल्का नहीं पड़ने दूँगा उसका रंग
इस बार नहीं बनने दूँगा उसे इतना लाचार
कि पान की पीक और खून का फर्क ही ख़त्म हो जाए
इस बार नहीं.......
इस बार घावों को देखना है
गौर से थोड़ा लंबे वक्त तक
कुछ फैसले और उसके बाद हौसले
कहीं तो शुरुआत करनी ही होगी
इस बार यही तय किया है
Zindagi Zindagi Mere Ghar Aana | Anuradha Paudwal, Bhupinder Singh| Dooriyan Songs | Sharmila Tagore
Film 'Dooriyan' (1979) ka ye gaana "Zindagi Zindagi Mere Ghar Aana" ek bahut hi pyaara aur sukoon dene wala geet hai. Ye gaana rishton ki gehrai aur ghar ki khushi ko bahut hi khoobsurti se bayaan karta hai.
Is gaane ki kuch khaas jankari niche di gayi hai:
Gaane ka Details:
Gaayak (Singers): Anuradha Paudwal aur Bhupinder Singh
Sangeetkar (Music Director): Jaidev
Geetkar (Lyrics): Gulzar
Film: Dooriyan (1979)
Cast: Sharmila Tagore aur Uttam Kumar
Is Gaane ki Visheshtayein:
Gulzar ki Shayari: Gulzar sahab ne zindagi ko ek mehman ki tarah ghar aane ka nyota diya hai. Unke bol bahut hi gehre aur dil ko chhu lene wale hain.
Jaidev ka Sangeet: Sangeetkar Jaidev ne is gaane mein ek bahut hi shaant aur madhur dhun di hai jo sunne wale ke mann ko shaanti deti hai.
Anuradha Paudwal aur Bhupinder Singh: Anuradha Paudwal ki naram awaaz aur Bhupinder Singh ki bhari awaaz ka mel is gaane ko ek unique pehchan deta hai.
Uttam Kumar aur Sharmila Tagore: Bengal ke mahanayak Uttam Kumar aur Sharmila Tagore ki jodi ne is gaane mein ek paripakv (mature) aur sundar rishte ko parde par utara hai.
Gaane ke Bol (Main Lines):
"Zindagi zindagi mere ghar aana, mere ghar aana Zindagi zindagi mere ghar aana, mere ghar aana Aana doston ki tarah, haath thame huye..."
SEENE MEIN JALAN AANKHON MEIN TOOFAN SA KYUN HAI - SURESH WADKAR
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Kabhi Kisi Ko Mukumal Jahan by Bhupinder Singh
भूपिंदर सिंह का गाया गीत "कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता" भारतीय सिनेमा के सबसे भावुक और दार्शनिक गीतों (philosophical songs) में से एक है।
यह गाना 1981 में आई फ़िल्म 'आहिस्ता आहिस्ता' (Ahista Ahista) का है।
यहाँ इस गीत और फ़िल्म से जुड़ी विस्तृत जानकारी और कुछ दिलचस्प तथ्य दिए गए हैं:
फ़िल्म और गीत का विवरण
| विवरण | जानकारी |
| फ़िल्म का नाम | आहिस्ता आहिस्ता (Ahista Ahista) (1981) |
| गायक (Male Version) | भूपिंदर सिंह (Bhupinder Singh) |
| संगीतकार | ख़य्याम (Khayyam) |
| गीतकार | निदा फ़ाज़ली (Nida Fazli) |
| निर्देशक | इस्माईल श्रॉफ (Esmayeel Shroff) |
| मुख्य कलाकार | कुणाल कपूर, पद्मिनी कोल्हापुरे, नंदा, शम्मी कपूर |
| गीत का मूड | उदास, दार्शनिक ग़ज़ल |
गीत से जुड़े दिलचस्प तथ्य (Interesting Facts)
ग़ज़ल का मास्टरपीस संयोजन: यह गीत भारतीय सिनेमा के तीन महान कलाकारों—गायकी में भूपिंदर सिंह, संगीत में ख़य्याम, और शायरी में निदा फ़ाज़ली—के बेहतरीन तालमेल का नतीजा है।
दो संस्करण (Two Versions): इस गीत के दो क्लासिक संस्करण हैं:
पुरुष संस्करण (Male Version): जिसे भूपिंदर सिंह ने अपनी गहरी और मखमली आवाज़ में गाया है।
महिला संस्करण (Female Version): जिसे प्रसिद्ध गायिका आशा भोसले ने गाया है। दोनों ही संस्करण बहुत लोकप्रिय हुए थे।
फ़िल्म का आधार (Source Material): फ़िल्म 'आहिस्ता आहिस्ता' 1967 की कन्नड़ फ़िल्म 'गेज्जे पूजे' (Gejje Pooje) की रीमेक थी।
निदा फ़ाज़ली की शायरी: यह ग़ज़ल मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली ने लिखी थी, और यह उनके सबसे प्रसिद्ध फिल्मी गीतों में से एक है। ग़ज़ल जीवन की कड़वी सच्चाई को बयां करती है कि किसी को भी कभी मुकम्मल (संपूर्ण) जहाँ (दुनिया/खुशी) नहीं मिलती। यह निराशा और उम्मीद के मिश्रण को खूबसूरती से दर्शाती है।
ख़य्याम का संगीत: ख़य्याम साहब को उनके भावपूर्ण और ग़ज़ल-आधारित संगीत के लिए जाना जाता है। उन्होंने इस गीत को एक ऐसी धीमी और मार्मिक धुन दी जो भूपिंदर सिंह की आवाज़ की गहराई के साथ पूरी तरह से मेल खाती है।
कलाकार: इस फ़िल्म में कुणाल कपूर (शशि कपूर के बेटे) और पद्मिनी कोल्हापुरे मुख्य भूमिकाओं में थे।
यह गीत आज भी उन लोगों के बीच एक कालातीत (timeless) क्लासिक बना हुआ है जो शायरी और भावपूर्ण संगीत पसंद करते हैं।
ye kya jageh hai film umrao jaan
ग़ज़ल का विवरण: "ये क्या जगह है दोस्तों"
यह गीत उमराव जान के जीवन के अकेलेपन, पहचान के संकट (Identity Crisis) और उदासी को दर्शाता है।
| विशेषता | जानकारी |
| फ़िल्म | उमराव जान (Umrao Jaan) (1981) |
| गायक | आशा भोंसले (Asha Bhosle) |
| संगीतकार | ख़य्याम (Khayyam) |
| गीतकार | शहरयार (Shahryar) |
| कलाकार | रेखा (Umrao Jaan) |
वीडियो का सार और मूड
थीम: यह गीत तब आता है जब उमराव जान (रेखा) को अपने गृहनगर फ़ैज़ाबाद के क़रीब किसी पड़ाव पर रुकना पड़ता है। यहाँ, वह अपने पुराने जीवन और नए जीवन के बीच के विरोधाभास को महसूस करती है।
भावनात्मक गहराई: यह गीत पूरी तरह से नायिका की आंतरिक पीड़ा (internal pain) को व्यक्त करता है। वह अपनी क़िस्मत और जीवन से पूछती है कि वह उसे कहाँ ले आया है, जहाँ चारों तरफ सिर्फ़ धूल और उदासी (ग़ुबार ही ग़ुबार) है।
मुख्य पंक्तियाँ:
ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है
हद-ए-निगाह तक जहाँ, ग़ुबार ही ग़ुबार है
ये किस मक़ाम पर हयात, मुझको लेके आ गयी
ना बस ख़ुशी पे जहाँ, ना ग़म पे इख़्तियार है
यह पंक्तियाँ बताती हैं कि जीवन उसे ऐसी जगह ले आया है, जहाँ उसे न तो ख़ुशी पर नियंत्रण है और न ही वह अपने ग़मों को नियंत्रित कर सकती है।
फ़िल्म 'उमराव जान' (1981) के बारे में दिलचस्प तथ्य
क्लासिक उपन्यास पर आधारित: यह फ़िल्म मिर्ज़ा हादी रुसवा के 1905 के उर्दू उपन्यास 'उमराव जान अदा' पर आधारित है, जिसे उर्दू साहित्य के महान उपन्यासों में गिना जाता है।
रेखा का करियर का शिखर: अभिनेत्री रेखा ने अपने उमराव जान के किरदार के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (National Film Award) जीता, जिसे उनके करियर की सबसे शानदार प्रस्तुतियों में से एक माना जाता है।
संगीत की सफलता: फ़िल्म का संगीत हिंदी सिनेमा के सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ (Best of all time) साउंडट्रैक में से एक है। ख़य्याम को इस संगीत के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
आशा भोंसले का सम्मान: इस फ़िल्म के गीतों (ख़ासकर "दिल चीज़ क्या है") के लिए आशा भोंसले को भी राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, जो उनके करियर का एक महत्वपूर्ण पल था।
निर्देशन और कला: निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली (जो एक चित्रकार भी हैं) ने 19वीं सदी के लखनऊ की नवाबी तहज़ीब और वास्तुकला को पर्दे पर जीवंत कर दिया। फ़िल्म ने सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन (Best Art Direction) का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।
पहले विकल्प नहीं थे संगीतकार: दिलचस्प बात यह है कि ख़य्याम, मुज़फ़्फ़र अली की संगीतकार के तौर पर पहली पसंद नहीं थे। उन्होंने पहले जयदेव और फिर नौशाद से संपर्क किया था, लेकिन अंततः यह काम ख़य्याम ने किया और इतिहास रच दिया।
SHARAB CHEEZ HI AISI HAI PANKAJ UDAS
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RABBI - Bulla Ki Jaana
"बुल्ला की जाणा मैं कौण" (Bulla Ki Jaana Maen Kaun) केवल एक गाना नहीं, बल्कि एक रूहानी अनुभव है जिसने 2004-05 के दौरान भारतीय संगीत जगत में क्रांति ला दी थी। रब्बी शेरगिल (Rabbi Shergill) की आवाज़ और गिटार की धुनों ने सूफी संगीत को एक नया और आधुनिक रूप दिया।
यहाँ इस प्रतिष्ठित गीत के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है:
गीत का विवरण
गायक और संगीतकार: रब्बी शेरगिल (Rabbi Shergill)
गीतकार: बाबा बुल्ले शाह (Baba Bulleh Shah) - 18वीं सदी के महान सूफी संत।
एल्बम: रब्बी (Rabbi - 2004)
शैली (Genre): सूफी-रॉक (Sufi Rock)
इस गीत की खास बातें
बुल्ले शाह की कविता: इस गीत के बोल बाबा बुल्ले शाह की एक प्रसिद्ध 'काफी' (कविता) पर आधारित हैं। इसमें इंसान की अपनी पहचान की तलाश और ईश्वर के प्रति समर्पण को दर्शाया गया है। यह कहता है कि मैं न मंदिर में हूँ, न मस्जिद में, और न ही किसी रस्म-ओ-रिवाज़ में।
सूफी-रॉक का जन्म: रब्बी शेरगिल ने पारंपरिक सूफी कलाम को इलेक्ट्रिक गिटार और रॉक बीट्स के साथ मिलाकर एक नई शैली तैयार की, जिसे युवाओं ने बहुत पसंद किया।
सादगी भरा वीडियो: इस गाने का म्यूजिक वीडियो भी बहुत सादा था, जिसमें रब्बी को दिल्ली की सड़कों पर गिटार बजाते हुए दिखाया गया था। इसने गाने की सच्चाई (authenticity) को और बढ़ा दिया।
गीत के बोल (मुख्य अंश)
"ना मैं मोमिन विच मसीतां, ना मैं विच कुफर दीयां रीतां ना मैं पाकां विच पलीती, ना मैं मूसा ना फिरौन बुल्ला की जाणा मैं कौण..."
गीत का गहरा अर्थ
इस गाने का सार यह है कि मनुष्य खुद को धर्म, जाति, स्थान या नाम की सीमाओं में बांधता है, जबकि उसकी असली पहचान इन सबसे परे है। यह अस्तित्ववाद (Existentialism) और आध्यात्मिकता का एक अनूठा संगम है।
(This video is posted by channel – {Rabbi Shergill} on YouTube, and Raree India has no direct claims to this video. This video is added to this post for knowledge purposes only.)
Rekha Bhardwaj Tere ishq mein.mp4
यह गीत रेखा भारद्वाज (Rekha Bhardwaj) के शुरुआती नॉन-फ़िल्मी एलबमों में से एक है, जिसने उन्हें एक ग़ज़ल और सूफी गायिका के रूप में पहचान दिलाई थी।
यह गीत "तेरे इश्क़ में" उनके पॉप कलेक्शन एलबम 'इश्क़ा इश्क़ा' (Ishqa Ishqa) का हिस्सा है।
यहाँ इस वीडियो, गीत और एलबम के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है:
गीत और एलबम का विवरण
| विवरण | जानकारी |
| गीत का शीर्षक | तेरे इश्क़ में |
| एलबम | इश्क़ा इश्क़ा (Ishqa Ishqa) (लगभग 2000 के दशक की शुरुआत में रिलीज़) |
| गायक | रेखा भारद्वाज (Rekha Bhardwaj) |
| संगीत | विशाल भारद्वाज (Vishal Bhardwaj) |
| गीतकार | गुलज़ार (Gulzar) |
| शैली | मॉडर्न ग़ज़ल/पॉप/सूफी फ्यूजन |
वीडियो और गीत के बारे में विवरण
यह गीत रेखा भारद्वाज के करियर के उन शुरुआती गीतों में से एक है जिसने उनकी आवाज़ की विशेषता (distinctiveness) को स्थापित किया।
गीत का सार (Essence): यह गीत प्रेम में एकांत (loneliness) और तन्हाई को दर्शाता है। इसकी शुरुआत में ही गुलज़ार साहब की गहरी और काव्यात्मक पंक्तियाँ हैं: "तेरे इश्क़ में तन्हाईयाँ... तन्हाईयाँ... हमने बहुत बहलाईयाँ..."
संगीत की शैली: विशाल भारद्वाज ने इस गीत को एक समकालीन (contemporary) संगीत दिया है। यह पारंपरिक ग़ज़ल से हटकर है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक और आधुनिक वाद्य यंत्रों का उपयोग किया गया है, लेकिन इसका भाव सूफी और ग़ज़ल का है। यह उस समय के पॉप एलबमों में एक नया प्रयोग था।
वीडियो की विशेषता: इस गीत का म्यूज़िक वीडियो आमतौर पर एक एलबम वीडियो की तरह ही शूट किया गया है, जिसमें रेखा भारद्वाज को गाने को भावुक तरीके से प्रस्तुत करते हुए दिखाया गया है। यह वीडियो 2000 के दशक की शुरुआत के म्यूज़िक वीडियो एस्थेटिक्स को दर्शाता है, जिसमें सरल लेकिन कलात्मक सेट का उपयोग किया जाता था।
गुलज़ार और विशाल का सहयोग: यह गीत गुलज़ार (गीतकार) और विशाल भारद्वाज (संगीतकार) के सफल और प्रतिष्ठित सहयोग की एक और मिसाल है, जो रेखा भारद्वाज की आवाज़ के लिए विशेष रूप से लिखे गए गीतों के लिए प्रसिद्ध है।
यह गीत रेखा भारद्वाज के फैंस के बीच एक कल्ट क्लासिक (cult classic) माना जाता है, जो उनकी बाद की फ़िल्मी सफलताओं, जैसे 'फेमस' (Namak Ishq Ka) और 'ओ साथी रे' (Omkara) की नींव रखता है।
Afreen Afreen | Sangam (1996) | Hindi Video Song | Nusrat Fateh Ali Khan
"आफ़रीन आफ़रीन" (Afreen Afreen) संगीत की दुनिया का एक ऐसा अनमोल रत्न है जिसे दो अलग-अलग दौर में, दो अलग अंदाज़ में बेहद पसंद किया गया। मूल रूप से यह महान कव्वाल नुसरत फतेह अली खान की रचना है।
यहाँ इस गीत के दोनों लोकप्रिय वर्ज़न्स की जानकारी दी गई है:
1. मूल वर्ज़न (1996)
गायक: नुसरत फतेह अली खान
गीतकार: जावेद अख्तर
संगीत: नुसरत फतेह अली खान
वीडियो: इसमें लीसा रे (Lisa Ray) नज़र आई थीं, और यह म्यूजिक वीडियो उस समय बहुत बड़ा हिट हुआ था।
खासियत: यह नुसरत साहब के सबसे लोकप्रिय गैर-फिल्मी गीतों में से एक है। इसमें उन्होंने पारंपरिक कव्वाली और पॉप संगीत का बेहतरीन मेल पेश किया था।
2. कोक स्टूडियो वर्ज़न (Coke Studio Season 9 - 2016)
गायक: राहत फतेह अली खान और मोमिना मुस्तेहसन
खासियत: इस वर्ज़न ने इंटरनेट पर धूम मचा दी थी। मोमिना मुस्तेहसन की सुरीली आवाज़ और राहत साहब की गायकी ने इसे नई पीढ़ी का पसंदीदा गाना बना दिया।
लोकप्रियता: यह यूट्यूब पर सबसे ज्यादा देखे जाने वाले दक्षिण एशियाई गानों में से एक है।
गीत के बोल और अर्थ
"आफ़रीन" (Afreen) एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ होता है "प्रशंसा करना" या "वाह-वाह करना"। यह गीत किसी की सुंदरता की तारीफ में लिखा गया है।
"ऐसा देखा नहीं खूबसूरत कोई जिस्म जैसे अजंता की मूरत कोई जिस्म जैसे निगाहों की जादुगरी जिस्म जैसे महकती हुई चांदनी..."
रोचक तथ्य
जावेद अख्तर ने इस गीत के माध्यम से सुंदरता को शब्दों में जिस तरह पिरोया है, उसे उर्दू शायरी का एक बेहतरीन उदाहरण माना जाता है।
नुसरत फतेह अली खान की आवाज़ का जादुई आलाप आज भी संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
(This video is posted by channel – {Saregama Karaoke}
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Maine Dil Se Kahan Dhoondh Laana Khushi Full 4K Video | K.K | Rog | Irfan Khan |
Film 'Rog' (2005) ka ye gaana "Maine Dil Se Kaha" aaj bhi har udaas dil ka sahara hai. Is gaane mein K.K. ki awaaz aur Irrfan Khan ki acting ne milkar ek aisa jaadu banaya hai jo kabhi purana nahi hota.
Is gaane ki kuch khaas baatein:
Gaane ka Details:
Gaayak (Singer): K.K. (Krishnakumar Kunnath)
Sangeetkar (Music): M. M. Keeravani (M. M. Kreem)
Geetkar (Lyrics): Neelesh Misra
Film: Rog (2005)
Lead Actor: Irrfan Khan
Is Gaane ki Visheshtayein:
K.K. ki Deep Voice: K.K. ne is gaane ko jis dard aur gehrai se gaya hai, wo seedhe sunne wale ke dil par asar karta hai. Ye unke sabse iconic sad songs mein se ek hai.
Irrfan Khan ki Acting: Film mein Irrfan Khan ne ek aise insaan ka role nibhaya hai jo andar se tuta hua hai. Unke expressive chehre ne is gaane ke dard ko dugna kar diya hai.
Lyrics ki Gehrai: "Maine dil se kaha dhoond laana khushi, nasamajh laya gum to yeh gum hi sahi" - Ye line zindagi ki kadi sacchai ko darshati hai.
M. M. Keeravani ka Sangeet: 'RRR' aur 'Baahubali' ke music director M. M. Keeravani ne is gaane ko bahut hi simple magar soulful dhun di hai.
Gaane ke Bol (Main Lines):
"Maine dil se kaha dhoond laana khushi Nasamajh laya gum, toh yeh gum hi sahi..."
(This video is posted by channel – {K.K.}
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